सिद्दारमैया की मांग: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाएं, 14 बार लिखित आपत्ति का दिया हवाला
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 23 सितंबर 2026 को बेंगलुरु में मीडिया को जारी बयान में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने की माँग की। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग के भीतर कथित आंतरिक मतभेद इतने गहरे हो चुके हैं कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई है। सिद्दारमैया के अनुसार, यह स्थिति देश की चुनावी विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा है।
14 आपत्तियाँ और उनका संदर्भ
सिद्दारमैया के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने ज्ञानेश कुमार की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय आयोग के विभिन्न फैसलों और कार्रवाइयों पर 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज की हैं। उनके अनुसार, ये कथित आपत्तियाँ नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, मतदाता सूची के डेटाबेस पर नियंत्रण, तथा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) की प्रक्रिया जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़ी हैं।
उन्होंने एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि एक चुनाव आयुक्त ने नए मतदाताओं के पंजीकरण में इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में आवश्यक कानूनी संशोधन के बिना नया सवाल जोड़े जाने पर आपत्ति जताई थी। उस रिपोर्ट में कथित बदलाव को 'अनधिकृत और अवैध' बताया गया था।
मतदाता सूची केंद्रीकरण पर सवाल
सिद्दारमैया ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के डेटाबेस को कथित तौर पर धीरे-धीरे केंद्रीकृत किया जा रहा है और स्थानीय चुनाव अधिकारियों की पहुँच पर पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं, जो कानूनी रूप से इस व्यवस्था के प्रबंधन के लिए अधिकृत हैं। उन्होंने सीधे सवाल किया कि राज्य स्तर के अधिकारियों के पास डेटाबेस की पूर्ण पहुँच क्यों नहीं है और बदलाव किसके अधिकार के तहत किए जा रहे हैं।
गौरतलब है कि मतदाता सूची प्रबंधन में पारदर्शिता का मुद्दा विपक्षी दलों द्वारा पिछले कई चुनावी चक्रों से उठाया जाता रहा है। यह पहली बार नहीं है जब किसी वरिष्ठ नेता ने आयोग के भीतरी कामकाज पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए हों।
पश्चिम बंगाल एसआईआर विवाद
पूर्व मुख्यमंत्री ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के तहत करीब 16 लाख मतदाताओं के नाम हटाने की अपील का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल किया कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा नाम शामिल करने का आदेश दिए जाने के बाद यह अपील किसने और किस अधिकार के तहत दाखिल की। उनके अनुसार, चुनाव आयुक्त संधू ने इस मामले में अधिकारियों से जवाब माँगा था, लेकिन न संधू को, न दूसरे चुनाव आयुक्त को और न ही पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इसके आधार की जानकारी दी गई थी।
राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की माँग
सिद्दारमैया ने इस पूरे मामले को नागरिकों के मतदान के मूल अधिकार से जोड़ते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से ज्ञानेश कुमार को सीईसी पद से हटाने और केंद्र सरकार को उनके खिलाफ जाँच का निर्देश देने की माँग की। उन्होंने यह भी दावा किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने उनकी मंजूरी के बिना आयोग के नाम पर पत्र, निर्देश और फैसले जारी किए जाने पर आपत्ति जताई थी।
उन्होंने कहा, 'चुनाव आयोग को संस्थागत तरीके से और संविधान तथा कानून के मुताबिक काम करना चाहिए। आयोग को ऐसा काम करते हुए नहीं दिखना चाहिए, जिससे लगे कि वह किसी राजनीतिक दल या सरकार के पक्ष में है।' उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलावों और आयोग के कथित आंतरिक मतभेदों पर पूर्ण पारदर्शिता एवं सार्वजनिक स्पष्टीकरण की माँग भी रखी।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग की स्वायत्तता को लेकर बहस तेज़ हो रही है। सिद्दारमैया की माँग पर केंद्र सरकार या चुनाव आयोग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक विशेषज्ञों की नज़र अब इस पर होगी कि क्या अन्य विपक्षी दल इस माँग में शामिल होते हैं और क्या राष्ट्रपति भवन इस पर कोई संज्ञान लेता है।