3 अक्टूबर 2026
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एसआईआर पर विपक्ष एकजुट: इंडिया ब्लॉक की 20 पार्टियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग पर अड़ीं

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एसआईआर पर विपक्ष एकजुट: इंडिया ब्लॉक की 20 पार्टियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग पर अड़ीं

सारांश

एसआईआर सिर्फ एक प्रशासनिक विवाद नहीं रहा — यह विपक्ष की एकता का नया केंद्र बन गया है। इंडिया ब्लॉक की 20 पार्टियाँ एक मंच पर आईं, 13 करोड़ नाम हटाने का आरोप लगा, और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग ने राष्ट्रीय स्वर ले लिया।

मुख्य बातें

इंडिया ब्लॉक की 20 पार्टियाँ 3 अक्टूबर को एसआईआर के विरोध में एकजुट हुईं और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग की।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि एसआईआर गरीब, दलित, मजदूर और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाताओं को निशाना बना रहा है।
मलिक मोतासिम खान ने दावा किया कि मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं।
कुमारी सैलजा के अनुसार चुनाव आयोग के सदस्यों ने एसआईआर पर 14 बार आपत्ति जताई, लेकिन उन्हें अनदेखा किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर को जारी रखने की अनुमति दी है; चुनाव आयोग ने अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी।

नई दिल्ली में 3 अक्टूबर को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में इंडिया ब्लॉक की 20 पार्टियाँ एकजुट हुईं और मुख्य चुनाव आयुक्त के तत्काल इस्तीफे की माँग को और तेज़ कर दिया। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग की मतदाता सूची शुद्धीकरण की यह प्रक्रिया गरीब, दलित, अल्पसंख्यक और पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाताओं को लक्षित कर उनके नाम सूची से हटा रही है।

इंडिया ब्लॉक की बैठक और साझा रुख

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बताया कि इंडिया ब्लॉक की एक बैठक बुलाई गई थी, जिसमें गठबंधन की 20 पार्टियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। उन्होंने कहा, कपिल सिब्बल सहित सभी की राय एकसमान थी — एसआईआर देश के लिए गलत है।

खड़गे ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया गरीब, कम पढ़े-लिखे, मजदूर और खासकर अल्पसंख्यक समुदायों के नाम मतदाता सूची से हटा रही है। उन्होंने सवाल उठाया, 'अगर किसी एक बूथ से 500 वोट हटा दिए जाएँ, तो क्या उस चुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र कहा जा सकता है?'

खड़गे ने यह भी कहा कि सत्ता के दुरुपयोग का सीधा असर युवाओं, गरीबों, दलितों और वंचितों पर पड़ रहा है। उनके अनुसार, संपन्न वर्ग तो किसी तरह अपना काम करवा लेता है, लेकिन गरीब को नाम सुधरवाने के लिए अपनी रोज़ी-रोटी छोड़कर दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

मुख्य आरोप: 13 करोड़ नाम हटाए गए, कर्नाटक में फॉर्म-7 विवाद

जमात-ए-इस्लामी हिंद से जुड़े मलिक मोतासिम खान ने दावा किया कि एसआईआर के ज़रिये मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक लोगों के नाम हटाए जा चुके हैं। उन्होंने कर्नाटक में फॉर्म-7 के ज़रिये वैध मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश के आरोप भी लगाए।

मोतासिम खान ने यह भी कहा कि पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाताओं — जिन्हें कथित तौर पर 'जेनज़ी वोटर' कहा जा रहा है — से फॉर्म-6 में माता-पिता और दादा-दादी की जानकारी माँगी जा रही है, जो उन्हें प्रक्रिया से हतोत्साहित कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एसआईआर को जारी रखने की अनुमति दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

चुनाव आयोग के भीतर असहमति का दावा

प्रोफेसर मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने कहा कि एसआईआर की शुरुआत से ही इसकी निष्पक्षता और मंशा पर सवाल उठते रहे हैं। उनके अनुसार, सबसे पहले इसे बिहार में जल्दबाज़ी में लागू किया गया — जहाँ चुनाव निकट थे — और इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हट गए। बाद में इसे पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में भी लागू किया गया।

उन्होंने यह भी दावा किया कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने एसआईआर को लेकर शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन उन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया — जिससे संस्था की आंतरिक दरार सार्वजनिक हो गई।

अन्य विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया

कांग्रेस सांसद कुमारी सैलजा ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के सदस्यों ने एसआईआर पर 14 बार आपत्ति जताई, लेकिन उनकी चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया गया। उन्होंने सवाल किया कि किसके इशारे पर यह अनदेखी की गई।

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने माँग की कि चुनाव आयोग देश की जनता से सार्वजनिक रूप से माफी माँगे। उन्होंने कहा कि देशव्यापी आंदोलन के दबाव में चुनाव आयोग अपना रवैया बदलने लगा है।

समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी ने कहा कि युवाओं और आम नागरिकों का सड़कों पर उतरना लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। कांग्रेस नेता गुरजीत सिंह औजला ने बताया कि पंजाब में बूथ-स्तरीय कार्यकर्ता सक्रिय हैं और किसी भी मत के अनुचित विलोपन पर कड़ी नज़र रख रहे हैं।

अभिनेता प्रकाश राज ने सवाल उठाया कि 2025 में मतदाता सूची का अद्यतन संस्करण जारी होने के महज़ छह महीने के भीतर एसआईआर की क्या ज़रूरत थी, और चुनाव आयोग में किस प्रक्रिया का पालन किया गया।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर को जारी रखने की अनुमति दे दी है, जिससे विपक्ष का संसदीय और जन-आंदोलन दोनों मोर्चों पर दबाव बनाने का इरादा और स्पष्ट हो गया है। गौरतलब है कि विपक्ष की यह एकजुटता आगामी राज्य विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। चुनाव आयोग की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या '13 करोड़ नाम हटाए गए' जैसे दावे स्वतंत्र रूप से सत्यापित हुए हैं — या ये राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित हैं। चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों की असहमति का दावा, यदि सही है, तो संस्थागत स्वायत्तता के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एसआईआर को जारी रखने की अनुमति देने के बाद विपक्ष के पास कानूनी रास्ते सीमित हैं, इसलिए यह आंदोलन चुनावी ध्रुवीकरण का औज़ार बनने का जोखिम भी रखता है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक रही है, वह यह है कि एसआईआर की प्रक्रियागत खामियों पर चुनाव आयोग का पक्ष अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ — जब तक वह नहीं आता, तस्वीर अधूरी है।
RashtraPress
3 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसआईआर (SIR) क्या है और यह विवादास्पद क्यों है?
एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण, चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची को शुद्ध करने की एक प्रक्रिया है जिसमें अपात्र या दोहरे नामों को हटाया जाता है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में गरीब, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम भी अनुचित तरीके से हटाए जा रहे हैं, जिससे यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरा बन गई है।
विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग क्यों कर रहा है?
विपक्षी दलों का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में एसआईआर के ज़रिये मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए गए और चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों की आपत्तियों को भी नज़रअंदाज़ किया गया। इसे विपक्ष संस्थागत पक्षपात मानता है।
13 करोड़ नाम हटाने का दावा कहाँ से आया?
जमात-ए-इस्लामी हिंद से जुड़े मलिक मोतासिम खान ने यह दावा किया कि एसआईआर के तहत मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं। यह दावा विपक्षी नेताओं ने किया है; चुनाव आयोग ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक खंडन या पुष्टि नहीं की है।
कर्नाटक में फॉर्म-7 विवाद क्या है?
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि कर्नाटक में फॉर्म-7 के ज़रिये वैध मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आवेदन जमा किए जा रहे हैं। साथ ही पहली बार मतदान करने वाले युवाओं से फॉर्म-6 में माता-पिता और दादा-दादी की जानकारी माँगी जा रही है, जो उन्हें पंजीकरण से हतोत्साहित कर सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर पर क्या रुख अपनाया है?
सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर को जारी रखने की अनुमति दे दी है। विपक्षी नेताओं ने इस पर निराशा जताई है और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। इसके बाद विपक्ष ने संसदीय और जन-आंदोलन दोनों रास्तों पर दबाव बढ़ाने का संकेत दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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