सुप्रीम कोर्ट का ₹1,537 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले में नोटिस, JKM इंफ्रा-ARC सेटलमेंट की होगी जांच
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 19 जून 2026 को एक जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों को नोटिस जारी किया है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ ₹1,537.59 करोड़ की कथित धोखाधड़ी की न्यायालय-निगरानी में जांच की मांग की गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने चार सप्ताह में जवाब तलब किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिका अधिवक्ता अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि नोएडा स्थित जेकेएम इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड — जो कथित तौर पर जालान परिवार के नियंत्रण में है — ने 2012 से 2015 के बीच भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की अगुवाई वाले सार्वजनिक बैंकों के समूह से लगभग ₹912 करोड़ का ऋण प्राप्त किया। याचिका के अनुसार, ये ऋण मात्र ₹60-72 करोड़ मूल्य की गिरवी संपत्ति के एवज में स्वीकृत किए गए थे और कंपनी ने धनराशि प्राप्त होने के कुछ ही समय बाद किश्तें देना बंद कर दिया।
फोरेंसिक ऑडिट के निष्कर्ष
अर्न्स्ट एंड यंग (EY) द्वारा किए गए और 23 मई 2018 को प्रस्तुत फोरेंसिक ऑडिट में कथित तौर पर पाया गया कि जाली दस्तावेजों, फर्जी इनवॉइस और अघोषित बैंक खातों के जरिए शेल कंपनियों तथा संदिग्ध संस्थाओं के माध्यम से ₹902 करोड़ से अधिक की राशि का डायवर्जन हुआ। याचिका में कहा गया है कि ऑडिट रिपोर्ट ने स्वयं स्वीकार किया था कि निष्कर्ष भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के मास्टर निर्देशों के तहत खाते को 'धोखाधड़ी वाला खाता' घोषित करने के सभी मानदंडों को पूरा करते हैं। इसके बावजूद, याचिकाकर्ता के अनुसार, खाते को कभी आधिकारिक रूप से धोखाधड़ी वाला नहीं माना गया।
ARC सेटलमेंट और सार्वजनिक धन का नुकसान
याचिका में आरोप है कि SBI ने 2020 में यह ऋण भारी छूट पर प्रूडेंट एआरसी लिमिटेड को हस्तांतरित कर दिया, जिसे बाद में 2025 में फीनिक्स एआरसी प्राइवेट लिमिटेड को ट्रांसफर किया गया। 31 अक्टूबर 2025 को फीनिक्स एआरसी ने ₹1,537 करोड़ से अधिक के बकाया ऋण के एवज में मात्र ₹73.50 करोड़ में समझौता कर लिया — यानी सार्वजनिक धन का 95 प्रतिशत से अधिक कथित नुकसान। याचिकाकर्ता के अनुसार, पूरी इस प्रक्रिया में न कोई संपत्ति ज़ब्त की गई, न कोई बैंक खाता फ्रीज़ किया गया और न ही किसी एजेंसी ने समन्वित जांच की।
एफआईआर और पूर्व कार्रवाई
याचिका में दो एफआईआर का उल्लेख किया गया है — दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दर्ज एफआईआर नंबर 53/2021 और उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर के फेज-1 थाने में दर्ज एफआईआर नंबर 43/2026। गौरतलब है कि EOW मामले में दाखिल क्लोजर रिपोर्ट को जनवरी 2026 में एक सक्षम अदालत ने खारिज कर दिया था और फोरेंसिक ऑडिट के निष्कर्षों पर आगे की जांच का निर्देश दिया था।
जनहित याचिका में मांगें और आगे की राह
याचिका में प्रवर्तन निदेशालय (ED) से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत व्यापक जांच, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) से कंपनी और उससे जुड़ी संस्थाओं की जांच, तथा RBI से बैंकों और एआरसी की भूमिका की समीक्षा के निर्देश मांगे गए हैं। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि डिफॉल्टर प्रमोटरों को बैकडोर सेटलमेंट के जरिए तनावग्रस्त संपत्तियों पर पुनः नियंत्रण पाने से रोका जाए। सर्वोच्च न्यायालय का अगला सुनवाई चार सप्ताह में निर्धारित है, जो इस मामले में जवाबदेही की दिशा तय करेगी।