20 अगस्त 2026
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सेबी का खुलासा: धेनु बिल्डकॉन ने ₹25 करोड़ को घुमाकर बनाया ₹1,000 करोड़ के कर्ज का भ्रम

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सेबी का खुलासा: धेनु बिल्डकॉन ने ₹25 करोड़ को घुमाकर बनाया ₹1,000 करोड़ के कर्ज का भ्रम

सारांश

सेबी का आरोप है कि धेनु बिल्डकॉन ने मात्र ₹25 करोड़ को परस्पर जुड़ी संस्थाओं में बार-बार घुमाकर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का कृत्रिम आभास बनाया और फिर ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट किया — यह भारतीय पूंजी बाजार में फंड लेयरिंग के सबसे बड़े कथित मामलों में से एक है।

मुख्य बातें

सेबी ने 19 अगस्त 2026 को अंतरिम आदेश में धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड पर गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी के आरोप लगाए।
कथित तौर पर ₹25 करोड़ की मूल राशि को चक्रित कर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का आभास बनाया गया।
दिसंबर 2025 में ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट बिना वास्तविक वित्तीय लेनदेन के किया गया — सेबी का प्रथम दृष्टया निष्कर्ष।
कथित संचालक सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन बताए गए हैं, जो नेटवर्क की संस्थाओं को नियंत्रित करते थे।
संस्थाओं के पंजीकृत कार्यालयों में वास्तविक भौतिक उपस्थिति नहीं मिली; चैट और कॉल रिकॉर्ड भी साक्ष्य के रूप में उद्धृत।
यह अंतरिम आदेश है; जांच जारी है और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।

बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 19 अगस्त 2026 को एक अंतरिम आदेश में आरोप लगाया है कि धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड ने परस्पर जुड़ी संस्थाओं के एक सुनियोजित नेटवर्क के माध्यम से मात्र ₹25 करोड़ की मूल राशि को बार-बार चक्रित कर ₹1,000 करोड़ के वास्तविक असुरक्षित कर्ज का कृत्रिम आभास उत्पन्न किया। यह आदेश सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय द्वारा पारित किया गया है।

कथित धोखाधड़ी का तरीका

सेबी के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान धेनु बिल्डकॉन को कथित तौर पर सात संस्थाओं से ₹1,000 करोड़ का असुरक्षित कर्ज प्राप्त हुआ। इसके बाद दिसंबर 2025 में कंपनी ने इनमें से छह संस्थाओं को प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के जरिए कथित ₹840 करोड़ के कर्ज को इक्विटी में परिवर्तित कर दिया।

हालांकि, संबंधित संस्थाओं के बैंक खातों की गहन जांच से पता चला कि यह पूरी ₹1,000 करोड़ की राशि वास्तव में ₹25 करोड़ की एक ही मूल धनराशि को परस्पर जुड़ी संस्थाओं के खातों में अलग-अलग स्तरों पर बार-बार स्थानांतरित कर निर्मित की गई थी। नियामक ने प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला है कि ये कर्ज लेनदेन वास्तविक नहीं थे।

संचालकों की पहचान और नेटवर्क की संरचना

सेबी ने आरोप लगाया है कि इस कथित व्यवस्था को सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन ने संचालित किया। नियामक के अनुसार, इस नेटवर्क में शामिल संस्थाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं दोनों के स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंधन में थीं।

सेबी ने इन संस्थाओं के बीच कई संदिग्ध समानताएं चिह्नित की हैं — जिनमें एक जैसे पंजीकृत पते, समान निदेशक, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता, एक ही बैंक शाखाएं और आपसी शेयर हिस्सेदारी शामिल हैं। इसके अलावा, शुरुआती ₹25 करोड़ की राशि भी अन्य संदिग्ध फंड लेनदेन से आई बताई गई है।

भौतिक निरीक्षण और डिजिटल साक्ष्य

इन संस्थाओं के पंजीकृत कार्यालयों के भौतिक निरीक्षण के दौरान गंभीर चिंताएं सामने आईं। सेबी ने कहा कि ऐसा प्रतीत हुआ कि इन संस्थाओं की वास्तविक भौतिक उपस्थिति और व्यावसायिक गतिविधियों का कोई ठोस आधार नहीं था।

नियामक ने एक असंबंधित मामले में तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान बरामद चैट संदेशों और कॉल रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया, जिनसे कथित रूप से इस नेटवर्क पर नियंत्रण के साक्ष्य मिले।

बाजार मूल्यांकन और प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट पर असर

सेबी ने यह भी रेखांकित किया कि ये कथित लेनदेन ऐसे समय में हुए जब धेनु बिल्डकॉन के बाजार मूल्यांकन में नाटकीय वृद्धि दर्ज की जा रही थी। नियामक के अनुसार, ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट किसी वास्तविक वित्तीय लेनदेन पर आधारित नहीं था, जो इसे सेबी के नियमों का उल्लंघन बनाता है।

आगे की कार्रवाई

यह अंतरिम आदेश है, जिसका अर्थ है कि जांच अभी जारी है और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। गौरतलब है कि सेबी के ऐसे अंतरिम आदेशों के बाद प्रायः व्यापार प्रतिबंध, संपत्ति कुर्की और अभियोजन जैसे कदम उठाए जाते हैं। धेनु बिल्डकॉन और संबंधित पक्षों की ओर से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ शेल संस्थाओं का जाल बुनकर छोटी राशि को विशाल दिखाया जाता है और फिर प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के जरिए वास्तविक शेयरधारकों को नुकसान पहुँचाया जाता है। सेबी का अंतरिम आदेश प्रथम दृष्टया है — अदालती परीक्षण में यह कितना टिकता है, यह देखना होगा। असली सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर कर्ज-से-इक्विटी रूपांतरण नियामकीय निगरानी से इतने समय तक कैसे बचा रहा, और क्या मौजूदा प्रकटीकरण ढाँचा ऐसी कृत्रिम बैलेंसशीट को समय रहते पकड़ने में सक्षम है।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धेनु बिल्डकॉन के खिलाफ सेबी ने क्या आरोप लगाए हैं?
सेबी ने आरोप लगाया है कि धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड ने परस्पर जुड़ी संस्थाओं के नेटवर्क के माध्यम से ₹25 करोड़ की मूल राशि को बार-बार चक्रित कर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का कृत्रिम आभास बनाया। इसके आधार पर ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट भी बिना वास्तविक वित्तीय लेनदेन के किया गया।
₹25 करोड़ से ₹1,000 करोड़ का कर्ज कैसे दिखाया गया?
सेबी के अनुसार, ₹25 करोड़ की एक ही मूल राशि को परस्पर जुड़ी संस्थाओं के बैंक खातों में अलग-अलग स्तरों पर बार-बार स्थानांतरित किया गया, जिससे कागजों पर ₹1,000 करोड़ के अलग-अलग कर्ज लेनदेन का आभास हुआ। इस तकनीक को 'फंड लेयरिंग' कहा जाता है।
इस मामले में सुरेंद्र जैन और वीरेंद्र जैन की क्या भूमिका बताई गई है?
सेबी ने आरोप लगाया है कि इस पूरे नेटवर्क को सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन ने संचालित किया। नियामक के अनुसार, नेटवर्क में शामिल संस्थाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं दोनों के स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंधन में थीं।
सेबी का यह आदेश अंतरिम क्यों है और आगे क्या होगा?
अंतरिम आदेश का अर्थ है कि जांच अभी पूरी नहीं हुई है और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। सेबी के ऐसे आदेशों के बाद प्रायः व्यापार प्रतिबंध, संपत्ति कुर्की या अभियोजन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
धेनु बिल्डकॉन के निवेशकों पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
सेबी के आरोपों के अनुसार, ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट बिना वास्तविक कर्ज के आधार पर किया गया, जिससे मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी कृत्रिम रूप से पतली हुई। इसके अलावा, कंपनी के बाजार मूल्यांकन में नाटकीय वृद्धि के दौरान हुए ये लेनदेन निवेशकों के हितों के लिए गंभीर जोखिम पैदा करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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