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सेबी का धेनु बिल्डकॉन पर बड़ा आरोप: ₹25 करोड़ को घुमाकर बनाया ₹1,000 करोड़ के कर्ज का झूठा जाल

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सेबी का धेनु बिल्डकॉन पर बड़ा आरोप: ₹25 करोड़ को घुमाकर बनाया ₹1,000 करोड़ के कर्ज का झूठा जाल

सारांश

सेबी ने धेनु बिल्डकॉन पर खुलासा किया कि महज ₹25 करोड़ को जुड़ी संस्थाओं में बार-बार घुमाकर ₹1,000 करोड़ के कर्ज का भ्रामक जाल बुना गया। इसके बाद ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट बिना किसी वास्तविक वित्तीय आधार के किया गया — यह भारतीय बाज़ार में कृत्रिम कर्ज संरचना के सबसे बड़े कथित मामलों में से एक है।

मुख्य बातें

सेबी ने धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किया, जिसमें ₹1,000 करोड़ के कृत्रिम कर्ज का आरोप है।
नियामक के अनुसार, मात्र ₹25 करोड़ की मूल राशि को आपस में जुड़ी संस्थाओं में बार-बार घुमाकर यह भ्रामक राशि तैयार की गई।
दिसंबर 2025 में कथित ₹840 करोड़ के कर्ज को प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के ज़रिए इक्विटी में बदला गया, जिसे सेबी ने वास्तविक नहीं माना।
कथित नेटवर्क को सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन द्वारा संचालित बताया गया है।
संस्थाओं के पंजीकृत कार्यालयों के निरीक्षण में वास्तविक व्यावसायिक गतिविधि का कोई ठोस आधार नहीं मिला।
चैट संदेश और कॉल रिकॉर्ड एक असंबंधित मामले की तलाशी के दौरान बरामद हुए, जो कथित नेटवर्क नियंत्रण के साक्ष्य बताए जा रहे हैं।

बाज़ार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड पर गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। सेबी के अनुसार, कंपनी ने आपस में जुड़ी संस्थाओं के एक सुनियोजित नेटवर्क के ज़रिए मात्र ₹25 करोड़ की मूल राशि को बार-बार विभिन्न खातों में घुमाकर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का कृत्रिम आभास तैयार किया। यह आरोप सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय द्वारा पारित अंतरिम आदेश में लगाए गए हैं।

कथित धोखाधड़ी का तरीका

सेबी के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान धेनु बिल्डकॉन को कथित तौर पर सात संस्थाओं से ₹1,000 करोड़ का असुरक्षित कर्ज प्राप्त हुआ दिखाया गया। इसके बाद दिसंबर 2025 में कंपनी ने प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के ज़रिए इनमें से छह संस्थाओं के कथित ₹840 करोड़ के कर्ज को इक्विटी में परिवर्तित कर दिया।

हालाँकि, इन संस्थाओं के बैंक खातों की जाँच से एक अलग ही तस्वीर सामने आई। नियामक ने पाया कि कथित ₹1,000 करोड़ की राशि वास्तव में एक ही ₹25 करोड़ की मूल राशि को परस्पर जुड़ी संस्थाओं के खातों में अलग-अलग स्तरों पर बार-बार प्रसारित करके तैयार की गई थी।

संस्थाओं के बीच संबंध और नियंत्रण

सेबी ने आरोप लगाया कि इस कथित व्यवस्था को सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन ने संचालित किया। नियामक ने इन संस्थाओं के बीच कई संदिग्ध समानताएं उजागर कीं — एक जैसे पंजीकृत पते, साझा निदेशक, समान अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता और एक ही बैंक शाखाओं में खाते। इसके अतिरिक्त, इन संस्थाओं के बीच बड़े पैमाने पर परस्पर शेयर हिस्सेदारी भी पाई गई।

नियामक के अनुसार, इस नेटवर्क से जुड़ी संस्थाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सुरेंद्र जैन और वीरेंद्र जैन के स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंधन के अधीन थीं। शुरुआती ₹25 करोड़ की राशि भी अन्य जुड़ी हुई संस्थाओं से संदिग्ध फंड लेनदेन के ज़रिए आई बताई जा रही है।

चैट संदेश और भौतिक जाँच के निष्कर्ष

सेबी ने एक असंबंधित मामले में तलाशी और जब्ती के दौरान बरामद चैट संदेशों और कॉल रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया, जिनसे कथित तौर पर इस नेटवर्क पर किए जा रहे नियंत्रण के साक्ष्य मिले। इसके अलावा, इन संस्थाओं के पंजीकृत कार्यालयों के भौतिक निरीक्षण में पाया गया कि उनकी वास्तविक भौतिक उपस्थिति और व्यावसायिक गतिविधियों का कोई ठोस आधार नहीं था।

बाज़ार मूल्यांकन और सेबी का प्रथम दृष्टया निष्कर्ष

नियामक ने यह भी रेखांकित किया कि कथित लेनदेन ऐसे समय में हुए जब धेनु बिल्डकॉन के बाज़ार मूल्यांकन में नाटकीय वृद्धि दर्ज की गई थी। फंड के ट्रेल के विश्लेषण के आधार पर सेबी ने प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला है कि कथित कर्ज वास्तविक लेनदेन नहीं थे और ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट बिना किसी वास्तविक वित्तीय आधार के किया गया था।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सेबी छोटी सूचीबद्ध कंपनियों में कृत्रिम कर्ज और शेयर मूल्य में हेरफेर के खिलाफ अपनी निगरानी तेज कर रहा है। आगे की कार्रवाई और अंतिम आदेश की प्रतीक्षा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें शेल संस्थाओं के जाल से बाज़ार मूल्यांकन को कृत्रिम रूप से फुलाया जाता है। असली सवाल यह है कि इतने व्यापक नेटवर्क — साझा पते, निदेशक, बैंक शाखाएं — के बावजूद यह लेनदेन नियामकीय निगरानी से इतने लंबे समय तक बाहर कैसे रहे। सेबी का यह अंतरिम आदेश महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम आदेश और आपराधिक संदर्भ के बिना इसका निवारक प्रभाव सीमित रहेगा।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धेनु बिल्डकॉन पर सेबी ने क्या आरोप लगाए हैं?
सेबी ने आरोप लगाया है कि धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड ने आपस में जुड़ी संस्थाओं के नेटवर्क के ज़रिए ₹25 करोड़ की मूल राशि को बार-बार घुमाकर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का कृत्रिम आभास तैयार किया। नियामक ने प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला है कि ये कर्ज वास्तविक लेनदेन नहीं थे।
₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट क्यों विवादास्पद है?
सेबी के अनुसार, दिसंबर 2025 में किया गया ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट उस कथित कर्ज को इक्विटी में बदलने के लिए था जो वास्तविक था ही नहीं। चूँकि मूल कर्ज को फर्जी बताया गया है, इसलिए यह अलॉटमेंट भी बिना वास्तविक वित्तीय आधार के हुआ माना जा रहा है।
इस कथित नेटवर्क को कौन संचालित कर रहा था?
सेबी के अनुसार, इस कथित व्यवस्था को सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन ने संचालित किया। नेटवर्क से जुड़ी संस्थाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं के स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंधन में बताई जा रही हैं।
सेबी को इस धोखाधड़ी का पता कैसे चला?
सेबी ने संस्थाओं के बैंक खातों की जाँच, पंजीकृत कार्यालयों के भौतिक निरीक्षण और एक असंबंधित मामले की तलाशी में बरामद चैट संदेशों व कॉल रिकॉर्ड के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला। भौतिक निरीक्षण में इन संस्थाओं की वास्तविक व्यावसायिक उपस्थिति का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला।
इस मामले में आगे क्या होगा?
अभी तक सेबी का अंतरिम आदेश जारी हुआ है, जो प्रथम दृष्टया निष्कर्षों पर आधारित है। धेनु बिल्डकॉन और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा, जिसके बाद नियामक अंतिम आदेश पारित करेगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए आगे की नियामकीय और संभावित कानूनी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है।
राष्ट्र प्रेस
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