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सेबी का खुलासा: धेनु बिल्डकॉन ने ₹25 करोड़ को घुमाकर बनाया ₹1,000 करोड़ के कर्ज का झूठा जाल

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सेबी का खुलासा: धेनु बिल्डकॉन ने ₹25 करोड़ को घुमाकर बनाया ₹1,000 करोड़ के कर्ज का झूठा जाल

सारांश

महज़ ₹25 करोड़ को जुड़ी संस्थाओं के बीच बार-बार घुमाकर ₹1,000 करोड़ के कर्ज का भ्रम — और फिर उस 'कर्ज' को ₹840 करोड़ के इक्विटी में बदलना। सेबी के अंतरिम आदेश ने धेनु बिल्डकॉन के इस कथित वित्तीय जाल को उजागर किया है।

मुख्य बातें

सेबी ने 19 अगस्त 2026 को अंतरिम आदेश में धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड पर ₹1,000 करोड़ के फर्जी कर्ज के निर्माण का आरोप लगाया।
नियामक के अनुसार, केवल ₹25 करोड़ की मूल राशि को परस्पर जुड़ी संस्थाओं में बार-बार परिचालित कर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का आभास बनाया गया।
दिसंबर 2025 में प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के ज़रिए ₹840 करोड़ के कथित कर्ज को इक्विटी में परिवर्तित किया गया, जिसे सेबी ने वास्तविक वित्तीय आधार से रहित बताया।
कथित नेटवर्क का संचालन सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन द्वारा किए जाने का आरोप है।
संस्थाओं के भौतिक निरीक्षण में वास्तविक व्यावसायिक उपस्थिति का अभाव पाया गया; चैट संदेश और कॉल रिकॉर्ड भी साक्ष्य के रूप में उद्धृत।
यह लेनदेन उस दौर में हुए जब कंपनी के बाज़ार मूल्यांकन में नाटकीय वृद्धि दर्ज की गई थी।

बाज़ार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने आरोप लगाया है कि धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड ने परस्पर जुड़ी संस्थाओं के एक सुनियोजित नेटवर्क के ज़रिए महज़ ₹25 करोड़ की मूल राशि को बार-बार आपस में हस्तांतरित कर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का भ्रामक आभास उत्पन्न किया। यह आरोप सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय द्वारा 19 अगस्त 2026 को पारित अंतरिम आदेश में लगाए गए हैं।

कथित वित्तीय षड्यंत्र का तंत्र

सेबी के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान धेनु बिल्डकॉन को कथित तौर पर सात संस्थाओं से ₹1,000 करोड़ का असुरक्षित कर्ज प्राप्त हुआ। इसके बाद कंपनी ने दिसंबर 2025 में प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के माध्यम से इन छह संस्थाओं के कथित ₹840 करोड़ के कर्ज को इक्विटी में परिवर्तित कर दिया।

नियामक ने कहा कि संबंधित संस्थाओं के बैंक खातों की विस्तृत जाँच से यह स्पष्ट हुआ कि तथाकथित ₹1,000 करोड़ की राशि वास्तव में ₹25 करोड़ की एकमात्र मूल राशि थी, जिसे परस्पर संबद्ध संस्थाओं के खातों के बीच बार-बार और अलग-अलग स्तरों पर परिचालित किया गया था। सेबी ने यह भी आरोप लगाया कि यह प्रारंभिक ₹25 करोड़ भी अन्य जुड़ी संस्थाओं से हुए संदिग्ध फंड लेनदेन से उत्पन्न हुई थी।

नेटवर्क पर नियंत्रण और संबंधों का जाल

नियामक के अनुसार, इस कथित व्यवस्था को सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन ने संचालित किया। इस नेटवर्क में शामिल संस्थाएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं दोनों के स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंधन में थीं।

सेबी ने इन संस्थाओं के बीच कई संदिग्ध समानताएँ भी चिह्नित कीं — एक जैसे पंजीकृत पते, साझा निदेशक, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता, समान बैंक शाखाएँ और आपस में बड़े पैमाने पर क्रॉस-शेयरहोल्डिंग। इन संस्थाओं के पंजीकृत कार्यालयों के भौतिक निरीक्षण में यह भी पाया गया कि इनकी वास्तविक भौतिक उपस्थिति और व्यावसायिक गतिविधि का कोई ठोस आधार नहीं था।

चैट संदेश और कॉल रिकॉर्ड बने अहम साक्ष्य

सेबी ने एक असंबंधित मामले में की गई तलाशी और जब्ती कार्रवाई के दौरान बरामद चैट संदेशों और कॉल रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया। नियामक के अनुसार, इन साक्ष्यों से इस नेटवर्क पर कथित रूप से किए जा रहे केंद्रीकृत नियंत्रण के संकेत मिले।

फंड के प्रवाह के विश्लेषण के आधार पर सेबी ने प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला है कि कथित कर्ज वास्तविक वित्तीय लेनदेन पर आधारित नहीं थे। तदनुसार, नियामक ने आरोप लगाया कि ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट किसी वास्तविक वित्तीय आधार के बिना ही किया गया।

बाज़ार मूल्यांकन में संदिग्ध उछाल

सेबी ने यह भी रेखांकित किया कि ये कथित लेनदेन ऐसे समय में हुए जब धेनु बिल्डकॉन के बाज़ार मूल्यांकन में नाटकीय वृद्धि दर्ज की गई थी। नियामक ने इस संयोग को संदिग्ध बताया है।

आगे क्या होगा

यह आदेश अंतरिम प्रकृति का है और मामले की जाँच जारी है। सेबी के इस कदम के बाद धेनु बिल्डकॉन और संबंधित पक्षों को नियामक के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। बाज़ार विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय पूँजी बाज़ार में फर्जी कर्ज और प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के दुरुपयोग के विरुद्ध नियामकीय सतर्कता को और सुदृढ़ करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो बाज़ार मूल्यांकन को कृत्रिम रूप से फुलाने के लिए इस्तेमाल की जाती रही है। चिंताजनक यह है कि ₹25 करोड़ की राशि को ₹1,000 करोड़ में बदलने का यह कथित तंत्र कई स्तरों पर — ऑडिटर, बैंक और नियामकीय फाइलिंग — से होकर गुज़रा, फिर भी समय रहते पकड़ में नहीं आया। असली सवाल यह है कि क्या सेबी का यह अंतरिम आदेश अंततः दोषसिद्धि और बाज़ार से स्थायी निष्कासन तक पहुँचेगा, या महज़ एक और लंबित जाँच बनकर रह जाएगा।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धेनु बिल्डकॉन पर सेबी ने क्या आरोप लगाए हैं?
सेबी ने आरोप लगाया है कि धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा लिमिटेड ने ₹25 करोड़ की मूल राशि को परस्पर जुड़ी संस्थाओं के बीच बार-बार हस्तांतरित कर ₹1,000 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का भ्रामक आभास बनाया। नियामक के अनुसार, यह कर्ज वास्तविक नहीं था और इसके आधार पर किया गया ₹840 करोड़ का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट भी वित्तीय रूप से निराधार था।
इस कथित घोटाले में कौन लोग शामिल बताए जा रहे हैं?
सेबी के अंतरिम आदेश के अनुसार, इस कथित नेटवर्क का संचालन सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन द्वारा किया गया। इस नेटवर्क में शामिल संस्थाएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं दोनों के स्वामित्व या नियंत्रण में थीं।
प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट में क्या गड़बड़ी बताई गई है?
सेबी के अनुसार, दिसंबर 2025 में धेनु बिल्डकॉन ने कथित ₹840 करोड़ के कर्ज को इक्विटी में बदलते हुए छह संस्थाओं को प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट दिया। चूँकि नियामक ने प्रथम दृष्टया पाया कि यह कर्ज ही वास्तविक नहीं था, इसलिए इस अलॉटमेंट को भी बिना वास्तविक वित्तीय आधार के किया गया बताया गया है।
सेबी को इस कथित धोखाधड़ी का पता कैसे चला?
सेबी ने संबंधित संस्थाओं के बैंक खातों का विश्लेषण किया और फंड के प्रवाह को ट्रेस किया। इसके अतिरिक्त, एक असंबंधित मामले में तलाशी और जब्ती के दौरान बरामद चैट संदेश और कॉल रिकॉर्ड भी इस नेटवर्क पर नियंत्रण के साक्ष्य के रूप में उद्धृत किए गए।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सेबी का यह आदेश अंतरिम प्रकृति का है और जाँच जारी है। धेनु बिल्डकॉन और संबंधित पक्षों को नियामक के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। अंतिम आदेश जाँच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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