सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में केंद्र की संशोधन याचिका खारिज, वेतन आय बाहर रहेगी
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2026 को ओबीसी क्रीमी लेयर आरक्षण से जुड़े मामले में केंद्र सरकार की संशोधन याचिका को सिरे से खारिज कर दिया और एक बार फिर स्पष्ट किया कि माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को क्रीमी लेयर निर्धारण में शामिल नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने दोहराया कि यह निर्धारण पूरी तरह पद और सेवा-स्थिति (स्टेटस-बेस्ड) के आधार पर होगा, न कि आय के आधार पर।
मूल फैसला और विवाद की पृष्ठभूमि
11 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय ने 'भारत सरकार बनाम रोहित नाथन' मामले में ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के मानदंडों को लेकर एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण दिया था। उस फैसले में कोर्ट ने साफ किया था कि क्रीमी लेयर तय करने में माता-पिता का पद — ग्रुप A, B, C या D — निर्णायक कारक है, न कि उनकी आय।
गौरतलब है कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के मूल प्रावधानों के अनुसार, वेतन और कृषि भूमि से होने वाली आय को ₹8 लाख की वार्षिक सीमा की गणना से कड़ाई से बाहर रखा गया था। आम धारणा के विपरीत, महज ₹8 लाख से अधिक वार्षिक वेतन होना किसी उम्मीदवार को स्वतः क्रीमी लेयर में नहीं डालता।
केंद्र सरकार की याचिका में क्या माँगा गया था
खारिज की गई याचिका में केंद्र सरकार ने मुख्यतः दो माँगें रखी थीं। पहली, कि 11 मार्च के फैसले को 'रेट्रोस्पेक्टिव' (पिछली तारीख से) के बजाय 'प्रोस्पेक्टिव' यानी भविष्य की तारीख से लागू किया जाए। दूसरी, कि सरकारी रैंक की तुलना PSU, बैंकों और निजी क्षेत्र के पदों से करने के लिए एक नई समान नीति तैयार करने हेतु सरकार को 2 वर्ष का अतिरिक्त समय दिया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों माँगों को अस्वीकार कर दिया।
सरकार का तर्क और न्यायालय की अस्वीकृति
सरकार का पक्ष था कि यदि 11 मार्च के फैसले को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया गया, तो 2012 से अब तक की गई नियुक्तियों, IAS, IPS, IFS कैडर आवंटन और वरिष्ठता सूचियों को फिर से संशोधित करना होगा। इससे ऐसे कर्मचारी भी प्रभावित होंगे जो इस मामले में पक्षकार भी नहीं हैं और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था बाधित हो सकती है।
न्यायालय ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और अपने मूल निर्णय को बरकरार रखा।
याचिकाकर्ता पक्ष की प्रतिक्रिया
याचिकाकर्ता के वकील वरुण ठाकुर ने मीडिया से कहा, 'ओबीसी आरक्षण से जुड़ी विसंगतियों, खासकर क्रीमी लेयर और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) से जुड़े मुद्दों को आज एक बार फिर स्पष्ट किया गया है।' उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की याचिका का सार यह था कि फैसला सही है, लेकिन जो लोग पहले ही अदालत का दरवाज़ा खटखटा चुके हैं, उन्हें राहत न मिले — और न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।
आगे क्या होगा
इस फैसले के बाद ओबीसी आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर निर्धारण के मौजूदा मामलों में अब 11 मार्च के फैसले का पूरा प्रभाव लागू होगा। सरकार को PSU और निजी क्षेत्र के पदों के लिए तुलनात्मक नीति बिना अतिरिक्त समय के तैयार करनी होगी। यह फैसला लाखों ओबीसी उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण है जो नौकरशाही पदों पर आरक्षण का लाभ उठाने के हकदार हैं।