29 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की AIF-FPI खुलासा याचिका खारिज, कहा — कोई कानूनी ढाँचा नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की AIF-FPI खुलासा याचिका खारिज, कहा — कोई कानूनी ढाँचा नहीं

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने TMC सांसद महुआ मोइत्रा की वह याचिका खारिज कर दी जिसमें AIF और FPI के वास्तविक लाभार्थी मालिकों का सार्वजनिक खुलासा अनिवार्य करने की माँग थी। पीठ ने कहा — बिना कानूनी ढाँचे के मैंडमस जारी नहीं हो सकता, हालाँकि सरकार और SEBI से संपर्क का रास्ता खुला छोड़ा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2026 को महुआ मोइत्रा की AIF-FPI 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' खुलासा याचिका खारिज की।
उपाध्याय की पीठ ने कहा — ऐसे खुलासे को अनिवार्य बनाने वाला कोई कानूनी या नियामक ढाँचा मौजूद नहीं है।
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट ऑफ मैंडमस जारी करने से इनकार किया।
मोइत्रा को केंद्र सरकार और SEBI से सीधे संपर्क करने की अनुमति दी गई।
वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया था कि अज्ञात विदेशी निवेशकों से शेयर बाज़ार में हेरफेर का खतरा है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका को विदेशी निवेश विरोधी बताते हुए इसका विरोध किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2026 को तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को निर्देश देने की माँग थी कि वह भारत में परिचालनरत अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIF) और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) के 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' (वास्तविक लाभार्थी मालिकों) तथा उनके निवेश पोर्टफोलियो का विवरण सार्वजनिक करे। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, आर. महादेवन और डी.के. उपाध्याय की पीठ ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे खुलासे को अनिवार्य बनाने वाला कोई मौजूदा कानूनी या नियामक ढाँचा अस्तित्व में नहीं है।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' की जानकारी पूर्णतः सार्वजनिक करने के लिए कोई विधायी या नियामक व्यवस्था न होने के कारण, सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत 'रिट ऑफ मैंडमस' जारी करने में असमर्थ है। पीठ ने सीधे शब्दों में कहा, 'ऐसे किसी ढाँचे के अभाव में यह न्यायालय अपने विवेक का इस्तेमाल करके प्रतिवादियों को ऐसी जानकारी पूरी तरह सार्वजनिक करने का आदेश देने वाली रिट ऑफ मैंडमस जारी नहीं कर सकता।'

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मोइत्रा को यह छूट अवश्य दी कि वे अपनी शिकायतों के संदर्भ में केंद्र सरकार और SEBI से सीधे संपर्क कर सकती हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क

मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ के समक्ष तर्क दिया कि विदेशी संस्थाओं के माध्यम से भारतीय कंपनियों में भारी पूँजी निवेश हो रही है, जबकि असली निवेशकों की पहचान अज्ञात बनी रहती है। उनके अनुसार, इस पारदर्शिता के अभाव से SEBI के नियमों के उल्लंघन और शेयर बाज़ार में हेरफेर की गुंजाइश बनती है। भूषण ने यह भी रेखांकित किया कि अनेक देशों में 'बेनिफिशियल ओनरशिप' की जानकारी सार्वजनिक करना पहले से अनिवार्य है।

सरकार की प्रतिक्रिया

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए यह आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता का वास्तविक उद्देश्य भारत में विदेशी निवेश के प्रवाह को बाधित करना है। इस आरोप का खंडन करते हुए भूषण ने कहा कि 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' का खुलासा होने से वैध निवेश प्रभावित नहीं होगा।

न्यायालय का निष्कर्ष

अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि AIF और FPI द्वारा किए गए निवेशों का विवरण SEBI अथवा कस्टोडियन को पहले से उपलब्ध कराया जाता है, जिससे नियामक निगरानी संभव है। किंतु अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई मौजूदा कानूनी ढाँचा नहीं है जो याचिका में माँगे गए इकाई-वार निवेशों का सार्वजनिक खुलासा अनिवार्य बनाता हो। पीठ ने कहा, 'अगर कोई ऐसी नीति है जिसके तहत सार्वजनिक खुलासा जरूरी है और आप उसे लागू करने के लिए मैंडमस की माँग करते हैं, तो वह अलग बात है — लेकिन अगर नीति ही अस्तित्व में नहीं है, तो क्या हम ऐसा आदेश जारी कर सकते हैं?'

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की पारदर्शिता को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस तेज़ हो रही है। मोइत्रा के पास अब केंद्र सरकार या SEBI के समक्ष विधायी संशोधन या नए नियामक ढाँचे की माँग करने का रास्ता खुला है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संसद में इस विषय पर कोई विधेयक लाया जाता है, तो भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो सकता है जो 'बेनिफिशियल ओनरशिप' पारदर्शिता को कानूनी रूप से बाध्यकारी मानते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि भारत में यह विषय अभी नीतिगत शून्य में है। गौरतलब है कि अदालत ने मोइत्रा को संसदीय या नियामक रास्ते की ओर जाने का इशारा किया — जो इस बहस को कोर्टरूम से नीति-निर्माण के मंच पर ले जाने का संकेत है। असली परीक्षा यह है कि क्या सरकार या SEBI इस विषय पर विधायी पहल करने की इच्छाशक्ति दिखाएगी।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महुआ मोइत्रा की सुप्रीम कोर्ट याचिका में क्या माँग थी?
याचिका में SEBI को यह निर्देश देने की माँग थी कि वह भारत में काम करने वाले AIF और FPI के 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' (वास्तविक लाभार्थी मालिकों) तथा उनके निवेश पोर्टफोलियो का पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से उजागर करना अनिवार्य करे। याचिकाकर्ता का तर्क था कि अज्ञात विदेशी निवेशकों से शेयर बाज़ार में हेरफेर का जोखिम है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने कहा कि 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य बनाने वाला कोई कानूनी या नियामक ढाँचा अस्तित्व में नहीं है। बिना इस आधार के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 'रिट ऑफ मैंडमस' जारी करना संभव नहीं था।
क्या महुआ मोइत्रा को कोई राहत मिली?
याचिका खारिज होने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने मोइत्रा को यह अनुमति दी कि वे अपनी शिकायतों के संदर्भ में केंद्र सरकार और SEBI से सीधे संपर्क कर सकती हैं। यह रास्ता उन्हें विधायी या नियामक स्तर पर इस मुद्दे को उठाने का अवसर देता है।
AIF और FPI क्या होते हैं और यह मामला आम निवेशकों के लिए क्यों मायने रखता है?
AIF (अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड) और FPI (फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर) भारतीय शेयर बाज़ार में बड़े पैमाने पर निवेश करने वाली संस्थाएँ हैं। यदि इनके वास्तविक मालिकों की पहचान अज्ञात रहती है, तो नियामक संस्थाओं के लिए संभावित बाज़ार हेरफेर या नियम उल्लंघन का पता लगाना कठिन हो जाता है, जो अंततः आम निवेशकों के हितों को प्रभावित कर सकता है।
सरकार का इस याचिका पर क्या रुख था?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का मकसद भारत में विदेशी निवेश को हतोत्साहित करना है। वकील प्रशांत भूषण ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि 'अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स' का खुलासा वैध निवेश को प्रभावित नहीं करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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