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सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की वर्चुअल पेशी याचिका खारिज की, जस्टिस दत्ता बोले — 'अंडों से डर?'

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सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की वर्चुअल पेशी याचिका खारिज की, जस्टिस दत्ता बोले — 'अंडों से डर?'

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने TMC सांसद महुआ मोइत्रा की वर्चुअल पेशी की माँग ठुकरा दी और जस्टिस दत्ता ने तीखी टिप्पणी की। याचिका वापस ली गई; अब 14 अगस्त को हागलबेरिया पुलिस के सामने व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त को महुआ मोइत्रा की वर्चुअल पेशी याचिका सुनने से इनकार किया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने 'अंडे फेंके जाने' की आशंका को भी खारिज किया।
याचिका अंततः वापस ली गई मानकर खारिज की गई।
मामला नादिया के हागलबेरिया पुलिस स्टेशन में दर्ज एक फेसबुक पोस्ट से जुड़े भड़काऊ भाषण के आरोप पर आधारित है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 14 अगस्त को व्यक्तिगत पेशी और 5 अक्टूबर तक कार्रवाई पर रोक का आदेश दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त को तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा की वह याचिका सुनने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने हेट स्पीच मामले में पुलिस के समक्ष वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश होने की अनुमति माँगी थी। याचिका अंततः वापस ली गई मानकर खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

महुआ मोइत्रा के विरुद्ध पश्चिम बंगाल के नादिया ज़िले के हागलबेरिया पुलिस स्टेशन में एक फेसबुक पोस्ट के आधार पर भड़काऊ भाषण और धार्मिक भावनाएँ आहत करने का मामला दर्ज किया गया है। इससे पहले कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ 5 अक्टूबर तक किसी भी कार्रवाई पर रोक लगाते हुए उन्हें 14 अगस्त को जाँच अधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ

सर्वोच्च न्यायालय में मोइत्रा के वकील ने तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल को वर्चुअल माध्यम से जाँच अधिकारी के सामने पेश होने की अनुमति दी जाए। वकील ने यह भी कहा कि मोइत्रा को आशंका है कि पुलिस स्टेशन जाने पर भीड़ उन पर हमला कर सकती है अथवा अंडे फेंक सकती है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने इन दोनों तर्कों को अस्वीकार कर दिया। पीठ ने पूछा, 'वर्चुअली क्यों? क्या इसलिए कि आप सांसद हैं?' और मोइत्रा की सुरक्षा संबंधी चिंता को भी खारिज करते हुए जस्टिस दत्ता ने कहा, 'आप सांसद हैं? राजनीति में आने के बाद भी आपको अंडों से डर लगता है? जबकि हमारे आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों ने अपनी छाती पर गोलियाँ खाई थीं।'

कोर्ट की टिप्पणी और याचिका की वापसी

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि इस प्रकार की याचिका दाखिल ही नहीं होनी चाहिए थी। इसके बाद मोइत्रा के वकील ने याचिका वापस लेने का अनुरोध किया, और पीठ ने उसे वापस ली गई मानकर खारिज कर दिया।

आगे क्या होगा

कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार महुआ मोइत्रा को अब 14 अगस्त को हागलबेरिया पुलिस स्टेशन के जाँच अधिकारी के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। 5 अक्टूबर तक उनके विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकती, परंतु जाँच प्रक्रिया जारी रहेगी। यह मामला संसदीय विशेषाधिकार और सामान्य नागरिक दायित्व के बीच की सीमारेखा को लेकर एक महत्त्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ बन गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

परंतु यह एक बड़े प्रश्न की ओर इशारा करता है: क्या निर्वाचित प्रतिनिधि सामान्य जाँच प्रक्रियाओं से छूट के हकदार हैं? कलकत्ता उच्च न्यायालय पहले ही 14 अगस्त की पेशी तय कर चुका था — ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना रणनीतिक रूप से कमज़ोर कदम साबित हुआ। यह प्रकरण दिखाता है कि न्यायपालिका राजनीतिक पद को जाँच से छूट का आधार मानने को तैयार नहीं है।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महुआ मोइत्रा के खिलाफ हेट स्पीच मामला क्या है?
महुआ मोइत्रा के विरुद्ध पश्चिम बंगाल के नादिया ज़िले के हागलबेरिया पुलिस स्टेशन में एक फेसबुक पोस्ट के आधार पर भड़काऊ भाषण और धार्मिक भावनाएँ आहत करने का मामला दर्ज है। यह मामला TMC सांसद के सोशल मीडिया पोस्ट से उत्पन्न विवाद से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की याचिका क्यों खारिज की?
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि वर्चुअल पेशी की माँग उचित नहीं थी और यह याचिका दाखिल ही नहीं होनी चाहिए थी। कोर्ट ने सांसद होने के आधार पर विशेष छूट देने से इनकार किया और सुरक्षा संबंधी आशंका को भी अस्वीकार कर दिया।
महुआ मोइत्रा को अब पुलिस के सामने कब पेश होना होगा?
कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार महुआ मोइत्रा को 14 अगस्त को हागलबेरिया पुलिस स्टेशन के जाँच अधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। 5 अक्टूबर तक उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकती।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने महुआ मोइत्रा पर क्या टिप्पणी की?
जस्टिस दत्ता ने कहा कि राजनीति में आने के बाद अंडे फेंके जाने की आशंका से डरना उचित नहीं है, और स्वतंत्रता सेनानियों का उदाहरण देते हुए याचिका की तर्कशक्ति पर सवाल उठाया। यह टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा याचिका को अनुचित ठहराने के संदर्भ में आई।
क्या कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश अभी भी लागू है?
हाँ, कलकत्ता उच्च न्यायालय का आदेश पूरी तरह लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश में कोई बदलाव नहीं किया, इसलिए 14 अगस्त की व्यक्तिगत पेशी और 5 अक्टूबर तक कार्रवाई पर रोक दोनों बरकरार हैं।
राष्ट्र प्रेस
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