मुंडवा नगर परिषद: आरएलपी की अलका कंदोई लगातार दूसरी बार अध्यक्ष, भाजपा प्रत्याशी को शून्य वोट
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान के नागौर जिले की मुंडवा नगर परिषद में अध्यक्ष पद के चुनाव में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) की उम्मीदवार अलका कंदोई ने 21 सितंबर 2026 को जीत दर्ज की, और यह दूसरी बार है जब आरएलपी ने इस नगर परिषद के अध्यक्ष पद पर अपनी पकड़ बनाए रखी। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि पार्षद चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की आधिकारिक उम्मीदवार गीता को एक भी वोट नहीं मिला।
मतदान का पूरा हिसाब
अध्यक्ष पद के चुनाव में अलका कंदोई को 13 वोट मिले, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार घनश्याम सदावत को 12 वोट प्राप्त हुए। भाजपा की आधिकारिक उम्मीदवार गीता को शून्य वोट मिले। अध्यक्ष पद जीतने के लिए 11 वोट की आवश्यकता थी।
भाजपा की आंतरिक टूट
पार्षद चुनाव में भाजपा ने 10 सीटें जीती थीं और 4 भाजपा-समर्थित निर्दलीय पार्षद भी विजयी हुए थे, यानी भाजपा समर्थित खेमे के पास कुल 14 पार्षदों का समर्थन था — जो बहुमत से कहीं अधिक था। परंतु पार्टी ने अध्यक्ष पद का टिकट वरिष्ठ नेताओं घनश्याम सदावत और रमाकांत शर्मा को दरकिनार कर पहली बार पार्षद बनीं गीता को दिया। इससे नाराज होकर घनश्याम सदावत ने भाजपा से बगावत की और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतर गए।
आरएलपी-कांग्रेस गठजोड़ ने पलटी बाज़ी
आरएलपी ने पार्षद चुनाव में 7 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के 3 पार्षद विजयी हुए थे। आरएलपी-कांग्रेस गठजोड़ को भाजपा के एक बागी पार्षद का समर्थन भी मिला, जिससे उनकी कुल संख्या 11 हो गई — बहुमत का न्यूनतम आँकड़ा। अंतिम मतदान में यह संख्या बढ़कर 13 तक पहुँची, जो बताती है कि कम से कम 2 और पार्षद भाजपा खेमे से निकलकर अलका कंदोई के पक्ष में आए।
व्यापक राजनीतिक संदर्भ
गौरतलब है कि राजस्थान के 32 निकायों में — जिनमें भीलवाड़ा और भरतपुर नगर निगम शामिल हैं — अध्यक्ष पद के चुनाव पहले ही निर्विरोध तय हो चुके थे। मुंडवा का यह परिणाम उन कुछ चुनावों में से एक है जहाँ खुला मुकाबला हुआ। यह ऐसे समय में आया है जब भाजपा राजस्थान में सत्ता में होते हुए भी स्थानीय निकाय राजनीति में अपने आंतरिक समन्वय की चुनौती से जूझ रही है।
आगे क्या
अलका कंदोई के लगातार दूसरी बार अध्यक्ष बनने से आरएलपी और उसके अध्यक्ष हनुमान बेनीवाल की नागौर क्षेत्र में पकड़ और मज़बूत होती दिखती है। भाजपा के लिए यह नतीजा पार्टी अनुशासन और उम्मीदवार चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।