सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा को लगाई कड़ी फटकार, वर्चुअल पेशी की याचिका खारिज
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त 2026 को तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कथित रूप से हिंसा भड़काने वाले सार्वजनिक बयानों से जुड़े मामले में जांच अधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति मांगी थी। शीर्ष अदालत ने इस दौरान तीखी मौखिक टिप्पणियाँ करते हुए कहा कि इस तरह की अर्जियाँ न्यायालय के समक्ष नहीं आनी चाहिए।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन से पूछा, 'वर्चुअली क्यों? सिर्फ इसलिए कि आप सांसद हैं?' अधिवक्ता ने दलील दी कि यदि मोइत्रा पुलिस स्टेशन में व्यक्तिगत रूप से पेश होती हैं तो उन्हें भीड़ के हमले की आशंका है और एक पुराने घटनाक्रम का हवाला दिया जिसमें कथित तौर पर उन पर अंडे फेंके गए थे।
इस दलील पर पीठ ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए मौखिक टिप्पणी की, 'आप सांसद हैं? राजनीति में आने के बाद आपको अंडों से डर लगता है? हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने तो सीने पर गोलियाँ खाई थीं। इस तरह की अर्जियाँ इस अदालत के सामने नहीं आनी चाहिए।'
याचिका वापसी
सर्वोच्च न्यायालय की इन तीखी टिप्पणियों के बाद मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। शीर्ष अदालत ने याचिका को वापस लिया हुआ मानते हुए खारिज कर दिया। पीठ ने स्पष्ट संकेत दिया कि मोइत्रा को जांच में व्यक्तिगत रूप से सहयोग करना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला महुआ मोइत्रा पर लगे उन आरोपों से जुड़ा है जिनमें कहा गया है कि उनके सार्वजनिक बयानों से हिंसा भड़कने की आशंका थी। इससे पहले न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने उन्हें 5 अक्टूबर तक अंतरिम संरक्षण देते हुए गिरफ्तारी सहित किसी भी कठोर पुलिस कार्रवाई पर रोक लगाई थी। यह संरक्षण इस शर्त के साथ दिया गया था कि मोइत्रा जांच में पूरा सहयोग करेंगी।
उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि पुलिस जांच जारी रख सकती है, लेकिन यदि मोइत्रा सहयोग करती हैं तो अंतरिम संरक्षण की अवधि में उनके विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय को बताया था कि मोइत्रा को पूछताछ के लिए चार बार नोटिस भेजा गया, किंतु उन्होंने संसदीय व्यस्तताओं का हवाला देते हुए पेशी नहीं दी।
सरकार और अदालत का रुख
उच्च न्यायालय ने पुलिस को निर्देश दिया था कि जब भी मोइत्रा पूछताछ के लिए आएं, कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न न होने दी जाए। इसके बावजूद मोइत्रा ने वर्चुअल उपस्थिति की माँग के साथ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसे शीर्ष अदालत ने स्वीकार नहीं किया।
आगे क्या होगा
याचिका खारिज होने के बाद महुआ मोइत्रा के लिए जांच अधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने का दायित्व बना हुआ है। उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया अंतरिम संरक्षण अभी भी प्रभावी है, बशर्ते वे जांच में सहयोग करें। यह मामला सांसदों की जवाबदेही और कानूनी प्रक्रिया में सहयोग के व्यापक सवाल को भी रेखांकित करता है।