12 जुलाई 2026
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महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: सूर्य, चंद्र, नाग और कुंडल से सजे बाबा महाकाल, हजारों श्रद्धालुओं ने लिए दर्शन

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महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: सूर्य, चंद्र, नाग और कुंडल से सजे बाबा महाकाल, हजारों श्रद्धालुओं ने लिए दर्शन

सारांश

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी पर भस्म आरती संपन्न हुई। सूर्य, चंद्रमा, त्रिपुंड, नाग और कुंडल से सजे बाबा महाकाल के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु रात से ही पंक्तिबद्ध रहे। कपिला गाय के गोबर और जड़ी-बूटियों से बनी भस्म से यह पावन अनुष्ठान पूरा हुआ।

मुख्य बातें

12 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी पर उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल को सूर्य, चंद्रमा, त्रिपुंड, नाग और कुंडल युक्त दिव्य शृंगार से सजाया गया।
भगवान महाकाल का जलाभिषेक और पंचामृत अभिषेक (दूध, दही, घी, शक्कर, फलों का रस) विधिवत संपन्न हुआ।
अब भस्म आरती में कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग होता है, श्मशान की राख का नहीं।
दर्शनार्थियों के लिए पुरुषों हेतु धोती-सोला और महिलाओं हेतु साड़ी अनिवार्य पोशाक है।
हजारों श्रद्धालु बीती रात से ही पंक्ति में खड़े रहे; मंदिर परिसर में व्यापक पुलिस बंदोबस्त रहा।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 12 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। इस दिव्य अनुष्ठान के साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु रात से ही मंदिर परिसर में एकत्रित हो गए थे।

कपाट खुलने का क्रम

रविवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही मंदिर का पूरा परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयघोष, घंटियों की टंकार, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो उठा। पुजारियों ने विधिवत मंत्रोच्चार के साथ भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर एवं फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न कराया।

दिव्य शृंगार और भस्म आरती

पवित्र भस्म अनुष्ठान से पूर्व बाबा महाकाल को सूर्य, चंद्रमा, त्रिपुंड, नाग और कुंडल युक्त अलौकिक शृंगार से सुसज्जित किया गया। इस दिव्य श्रृंगार के दर्शन पाकर श्रद्धालुओं की भावनाएँ उमड़ पड़ीं। मंदिर के पुजारी ने परंपरागत विधि-विधान के साथ महाआरती संपन्न कराई।

भस्म की परंपरा और नियम

जानकारी के अनुसार, पूर्व में महाकाल को श्मशान की राख अर्पित की जाती थी, किंतु अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों हेतु पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं हेतु साड़ी पहनना अनिवार्य है।

श्रद्धालुओं की भीड़ और व्यवस्था

बाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। इस अनुष्ठान के दर्शन के लिए आम जनमानस से लेकर著名 हस्तियाँ तक उज्जैन आती हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के मद्देनज़र मंदिर परिसर और उसके आसपास व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल की व्यापक तैनाती की गई थी। अनेक श्रद्धालु बीती रात से ही पंक्ति में खड़े होकर अपने आराध्य के दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे।

आगे का महत्व

आषाढ़ माह में महाकालेश्वर की भस्म आरती का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह ऐसे समय में आई है जब सावन माह की शुरुआत निकट है, जिसके चलते आने वाले सप्ताहों में श्रद्धालुओं की संख्या में और अधिक वृद्धि की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का केंद्र बन चुकी है। आषाढ़ से सावन के बीच यहाँ श्रद्धालुओं का जो सैलाब उमड़ता है, वह मध्य प्रदेश के धार्मिक पर्यटन की रीढ़ है। ध्यान देने योग्य है कि भस्म की परंपरा में बदलाव — श्मशान की राख से कपिला गाय के गोबर और जड़ी-बूटियों की ओर — एक सोचे-समझे प्रबंधकीय निर्णय को दर्शाता है, जो परंपरा और आधुनिक स्वच्छता मानकों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश है। सवाल यह है कि बढ़ती भीड़ के साथ दर्शन की गुणवत्ता और सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखना आने वाले सावन में कितनी बड़ी चुनौती होगी।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाला एक अनूठा वैदिक अनुष्ठान है, जिसमें बाबा महाकाल को विशेष भस्म अर्पित की जाती है। पहले यह भस्म श्मशान की राख से तैयार होती थी, अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से बनाई जाती है।
12 जुलाई 2026 को भस्म आरती का विशेष महत्व क्यों था?
12 जुलाई को आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी थी, जो हिंदू पंचांग में विशेष तिथि मानी जाती है। इस अवसर पर बाबा महाकाल को सूर्य, चंद्रमा, त्रिपुंड, नाग और कुंडल युक्त दिव्य शृंगार से सजाया गया, जिसके दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़े।
भस्म आरती में दर्शन के लिए क्या नियम हैं?
भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों को पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है। इसके अलावा दर्शन के लिए पूर्व पंजीकरण और समय पर पहुँचना आवश्यक होता है।
महाकाल का पंचामृत अभिषेक कैसे होता है?
कपाट खुलने के बाद पुजारी मंत्रोच्चार के साथ भगवान महाकाल का जलाभिषेक करते हैं, फिर दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक संपन्न होता है। इसके बाद दिव्य शृंगार और भस्म आरती का क्रम आता है।
उज्जैन महाकाल मंदिर में सावन के दौरान भीड़ कितनी बढ़ती है?
आषाढ़ के बाद आने वाले सावन माह में महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के मद्देनज़र मंदिर प्रशासन और पुलिस विशेष बंदोबस्त करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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