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जौहर बहादुरी नहीं — स्वरा भास्कर के बयान पर मौलाना साजिद रशीदी का स्पष्ट मत

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जौहर बहादुरी नहीं — स्वरा भास्कर के बयान पर मौलाना साजिद रशीदी का स्पष्ट मत

सारांश

स्वरा भास्कर के जौहर-बयान पर मौलाना साजिद रशीदी ने साफ़ कहा — जौहर बहादुरी नहीं, एक सामाजिक प्रथा थी। रानी लक्ष्मीबाई की तरह लड़ते हुए प्राण देना असली वीरता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रथा को धर्म से जोड़ना उचित नहीं।

मुख्य बातें

मौलाना साजिद रशीदी ने 4 सितंबर को कहा कि जौहर बहादुरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रथा थी।
स्वरा भास्कर ने अपने जौहर-संबंधी विवादास्पद बयान पर सार्वजनिक रूप से क्षमा माँग ली है।
रशीदी ने रानी लक्ष्मीबाई को असली वीरता का उदाहरण बताया — जिन्होंने युद्ध में लड़ते हुए प्राण दिए।
उनके अनुसार, पद्मावत की कथा मलिक मोहम्मद जायसी ने सदियों बाद काव्य-शैली में लिखी और इसे किसी धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता।
इस्लाम में स्वयं जीवन समाप्त करना जायज़ नहीं — न ही वेद या रामायण में जौहर का धार्मिक आदेश है, ऐसा रशीदी ने कहा।

अभिनेत्री स्वरा भास्कर के जौहर-संबंधी विवादास्पद बयान पर मौलाना साजिद रशीदी ने 4 सितंबर को नई दिल्ली में अपनी स्पष्ट राय रखी। उन्होंने कहा कि जौहर को वीरता का प्रतीक मानना उचित नहीं है, क्योंकि असली बहादुरी लड़ते हुए या तो शत्रु को पराजित करने में है या रणभूमि में प्राण देने में।

मौलाना का मुख्य तर्क

रशीदी ने कहा, 'देश में कई ऐसी बहादुर नारियाँ रही हैं, जिन्होंने लड़ते-लड़ते प्राण दे दिए। मेरा मानना है कि जौहर बहादुरी की बात नहीं है। बहादुरी वो है कि लड़ते-लड़ते या तो दुश्मन की जान ले ले या अपनी जान दे दे।' उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने युद्ध में अपने प्राण दिए — यही सच्ची वीरता है।

स्वरा भास्कर के बयान पर प्रतिक्रिया

मौलाना ने कहा कि स्वरा भास्कर ने अपने बयान पर क्षमा माँग ली है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि स्वरा के मूल बयान का एक निहितार्थ यह था कि जो महिलाएँ दुष्कर्म की पीड़िता हैं और जीवित हैं, वे 'कायर' हैं — जिसे रशीदी ने सिरे से खारिज किया। उनके अनुसार, जीवित रहना भी साहस का एक रूप है।

जौहर की ऐतिहासिक और धार्मिक व्याख्या

रशीदी ने कहा कि पद्मावत की कथा कई सदियों बाद मलिक मोहम्मद जायसी ने अपने शायराना अंदाज़ में लिखी, और इसे किसी धर्म विशेष से नहीं जोड़ा जा सकता। उन्होंने कहा, 'जिस तरह सती एक सामाजिक प्रथा थी, उसी तरह जौहर भी एक प्रथा थी — धर्म नहीं।' उनका मत है कि यह प्रथा रानी पद्मावती से शुरू हुई और वहीं समाप्त हो गई।

उन्होंने यह भी कहा कि इस्लाम में स्वयं अपना जीवन समाप्त करना जायज़ नहीं है, और न ही वेद या रामायण में इस तरह की कोई अनिवार्य प्रथा का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार, धार्मिक मान्यताएँ स्थायी होती हैं, जबकि सामाजिक प्रथाएँ कालांतर में समाप्त हो जाती हैं — जैसा सती प्रथा के साथ हुआ।

मुगल इतिहास पर रशीदी का पक्ष

मौलाना ने अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के प्रसंग पर कहा कि यदि खिलजी रानी को पकड़ भी लेते, तो वे उन्हें हरम में रानी का दर्जा देते। उन्होंने कहा कि मुगल बादशाहों के हरमों में हिंदू रानियाँ थीं और इसका आस्था से कोई संबंध नहीं था। रशीदी के अनुसार, मुस्लिम बादशाहों ने हिंदू राजाओं को पराजित करने के बाद उनकी रानियों के साथ दुष्कर्म नहीं किया।

आगे की बहस

रशीदी ने यह भी कहा कि आज यदि कोई मुसलमान कुरान की बात करता है तो उसे महिला-विरोधी करार दिया जाता है — यह एक सामाजिक विरोधाभास है जिस पर विमर्श होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब जौहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक व्याख्या को लेकर सार्वजनिक बहस तेज़ हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह केवल एक अभिनेत्री की टिप्पणी नहीं था — वह इस पुरानी बहस का नया अध्याय था कि सामाजिक प्रथाओं को वीरता का दर्जा देना कितना उचित है। मुख्यधारा की कवरेज इस बहस को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखती है, जबकि रशीदी का बयान उस ढाँचे को तोड़ता है।
RashtraPress
4 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मौलाना साजिद रशीदी ने जौहर के बारे में क्या कहा?
मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि जौहर बहादुरी नहीं है — असली वीरता लड़ते हुए शत्रु को पराजित करने या रणभूमि में प्राण देने में है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई को सच्ची वीरता का उदाहरण बताया।
स्वरा भास्कर ने जौहर पर क्या बयान दिया था और क्या उन्होंने माफ़ी माँगी?
स्वरा भास्कर के जौहर-संबंधी बयान को लेकर विवाद उठा था, जिसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से क्षमा माँग ली। रशीदी के अनुसार, उस बयान का एक निहितार्थ यह था कि जीवित बची दुष्कर्म पीड़िताएँ कायर हैं — जिसे उन्होंने पूरी तरह अस्वीकार किया।
क्या जौहर किसी धर्म की अनिवार्य मान्यता है?
मौलाना रशीदी के अनुसार, जौहर न हिंदू धर्म की अनिवार्य मान्यता है और न इस्लाम इसे जायज़ मानता है। उन्होंने कहा कि वेद और रामायण में इस तरह की कोई अनिवार्य प्रथा नहीं मिलती, और सती की तरह जौहर भी एक सामाजिक प्रथा थी जो समाप्त हो चुकी है।
पद्मावत की कथा का ऐतिहासिक आधार क्या है?
रशीदी ने कहा कि पद्मावत की कथा मलिक मोहम्मद जायसी ने कई सदियों बाद काव्य-शैली में लिखी थी। इसे किसी धर्म विशेष से जोड़ना उचित नहीं है, और दरबारी कवियों की परंपरा थी कि वे घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते थे।
मुगल बादशाहों और हिंदू रानियों के बारे में रशीदी ने क्या कहा?
रशीदी ने कहा कि मुगल बादशाहों के हरमों में हिंदू रानियाँ थीं और यह आस्था से नहीं, बल्कि राजनीतिक परंपराओं से जुड़ा था। उनके अनुसार, मुस्लिम बादशाहों ने हिंदू राजाओं को पराजित करने के बाद उनकी रानियों के साथ दुष्कर्म नहीं किया।
राष्ट्र प्रेस
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