डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने उपराष्ट्रपति भवन में अर्पित की पुष्पांजलि
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने सोमवार, 6 जुलाई 2026 को उपराष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने भारत की शैक्षिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक यात्रा पर एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
श्रद्धांजलि और उपराष्ट्रपति का संदेश
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि आज डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की गई। उन्होंने डॉ. मुखर्जी को 'प्रख्यात शिक्षाविद्, दूरदर्शी राजनेता और राष्ट्रनिर्माता' बताते हुए कहा कि उन्होंने देश की असाधारण सेवा की।
राधाकृष्णन ने रेखांकित किया कि डॉ. मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपतियों में से एक रहे, संविधान सभा के सदस्य थे, अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे, स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे।
राष्ट्रीय एकता और सर्वोच्च बलिदान
उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता के दृढ़ समर्थक डॉ. मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के लिए संघर्ष करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्होंने जोड़ा कि डॉ. मुखर्जी का जीवन और उनके आदर्श एक सशक्त, एकजुट, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण के सामूहिक संकल्प में पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे।
राधाकृष्णन ने यह भी कहा कि डॉ. मुखर्जी ऐसे भारत की परिकल्पना करते थे जहाँ प्रत्येक नागरिक एक समान संवैधानिक व्यवस्था के तहत समान अधिकारों का अधिकारी हो। उनके अनुसार, अनुच्छेद 370 को निरस्त किया जाना राष्ट्रीय एकीकरण के प्रति डॉ. मुखर्जी की आजीवन प्रतिबद्धता को सच्ची श्रद्धांजलि है।
डॉ. मुखर्जी का ऐतिहासिक योगदान
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में हुआ था। वह एक प्रमुख भारतीय राजनेता, विधिवेत्ता और शिक्षाविद् थे, जिन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
गौरतलब है कि डॉ. मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 का प्रबल विरोध किया था। उनका मत था कि यह प्रावधान राष्ट्रीय एकता के लिए बाधा है। वर्ष 1953 में वह बिना परमिट जम्मू-कश्मीर गए और उस व्यवस्था के विरोध में आंदोलन किया जिसके तहत भारतीय नागरिकों के राज्य में बसने पर प्रतिबंध था।
निधन और विरासत
डॉ. मुखर्जी के आंदोलन के बाद परमिट व्यवस्था समाप्त कर दी गई, किंतु 23 जून 1953 को जम्मू-कश्मीर में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। यह ऐसे समय में आया जब वह राज्य के पूर्ण एकीकरण की माँग को लेकर सक्रिय संघर्ष में थे। उनकी विरासत आज भी भारतीय राजनीति और राष्ट्रवादी विमर्श में केंद्रीय स्थान रखती है।