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क्या तमिलनाडु का यह रहस्यमयी मंदिर गयाजी जैसा पुण्य दिलाता है?

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क्या तमिलनाडु का यह रहस्यमयी मंदिर गयाजी जैसा पुण्य दिलाता है?

सारांश

तमिलनाडु का तिलतर्पणपुरी एक अत्यंत पवित्र स्थल है, जहां पितृ श्रद्धा और तर्पण की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है। यहां भगवान राम ने अपने पितरों की शांति के लिए पूजा की थी। इस अद्वितीय स्थान का रहस्य जानें और जानें यहां की खासियतें।

मुख्य बातें

तिलतर्पणपुरी पितृ कर्म के लिए एक प्रमुख स्थल है।
यहां राम ने अपने पितरों के लिए पूजा की थी।
आदि विनायक मंदिर का स्वरूप अद्वितीय है।
पितृ दोष निवारण के लिए यहां विशेष महत्व है।
यह स्थान कांचीपुरम से भी जुड़ा हुआ है।

तमिलनाडु, 19 सितंबर (राष्ट्र प्रेस)। पितृ श्रद्धा और तर्पण की परंपरा भारतीय संस्कृति में अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। दक्षिण भारत में इस परंपरा के लिए तमिलनाडु का तिलतर्पणपुरी सर्वोत्तम और पवित्र स्थलों में से एक है। मान्यता के अनुसार, यहीं पर भगवान राम ने अपने पितरों की शांति के लिए पूजा-अर्चना की थी।

इस स्थान की खासियत यह है कि यहां स्थित आदि विनायक मंदिर देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान गणेश का रूप मानव मुख वाला है, गजमुख नहीं। इस अनोखे स्वरूप को देखने के लिए हर साल हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान राम अपने पिता दशरथ का श्राद्ध कर रहे थे, तो उनके द्वारा बनाए गए चावल के पिंड बार-बार कीड़ों में बदल जाते थे। इस असामान्य स्थिति से परेशान होकर राम ने भगवान शिव से प्रार्थना की। तब भोलेनाथ ने उन्हें तिलतर्पण पुरी स्थित आदि विनायक मंदिर में पूजा करने का निर्देश दिया।

राम ने यहां आकर अनुष्ठान किया, जिसके बाद वे चार पिंड चार शिवलिंग में परिवर्तित हो गए। आज ये शिवलिंग पास ही स्थित मुक्तेश्वर मंदिर में विराजमान हैं। यही कारण है कि आज भी यहां मंदिर के भीतर ही पितृ शांति का अनुष्ठान होता है, जो सामान्यतः नदी तटों पर किया जाता है।

इस स्थान को तिल और तर्पण से जोड़कर तिलतर्पण पुरी नाम दिया गया है। यहां पितृ दोष निवारण, आत्म पूजा, अन्नदान और विशेषकर अमावस्या पर पिंड दान का अत्यधिक महत्व है।

श्रद्धालु मानते हैं कि यहां पितृ कर्म करने से पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और परिवार पर से पितृ दोष का प्रभाव समाप्त होता है।

मंदिर के परिसर में नंदीवनम (गोशाला) और भगवान शिव के चरण चिन्ह भी स्थित हैं, जो इसकी पवित्रता को और बढ़ाते हैं।

यह पवित्र स्थल तमिलनाडु के तिरुवरुर जिले के कुटनूर से मात्र २ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा, कुटनूर में देवी सरस्वती का एकमात्र मंदिर भी है, जिसे कवि ओट्टकुठार ने बनवाया था। श्रद्धालु तिलतर्पण पुरी आने पर सरस्वती मंदिर के दर्शन अवश्य करते हैं।

मंदिर के संरक्षक लक्ष्मण चेट्टियार बताते हैं कि हजारों भक्त यहां गणेश, सरस्वती और शिव के दर्शन के लिए आते हैं। नर मुख गणेश का यह मंदिर सांतवीं सदी का माना जाता है और मान्यता है कि माता पार्वती ने अपने मैल से गणेश का यह रूप बनाया था। इसे गणेश का पहला स्वरूप भी माना जाता है।

पितृ कर्म के लिए दक्षिण भारत में एक और प्रसिद्ध स्थल है कांचीपुरम, जिसे दक्षिण का काशी कहा जाता है। यहां विशेषकर नेनमेलि श्रद्धा संरक्षण नारायणन मंदिर में अमावस्या और एकादशी के दिन श्राद्ध कर्म का आयोजन होता है। यहां किया गया तर्पण गयाजी के श्राद्ध के समान महत्व रखता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह कहना उचित होगा कि पितृ कर्म और श्रद्धा की परंपराएं भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। तमिलनाडु के तिलतर्पणपुरी जैसे स्थलों की महत्ता इसे और भी बढ़ाती है, जो न केवल धार्मिक अपितु सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक हैं।
RashtraPress
21 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तिलतर्पणपुरी में पितृ कर्म करने का महत्व क्या है?
तिलतर्पणपुरी में पितृ कर्म करने से पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और परिवार पर से पितृ दोष का प्रभाव समाप्त होता है।
आदि विनायक मंदिर की खासियत क्या है?
आदि विनायक मंदिर देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान गणेश का स्वरूप मानव मुख वाला है।
कांजीपुरम का महत्व क्या है?
कांजीपुरम को दक्षिण का काशी कहा जाता है, जहां विशेष दिन जैसे अमावस्या और एकादशी पर पितृ कर्म का आयोजन होता है।
राष्ट्र प्रेस
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