सर्वदलीय बैठक से विपक्ष का वॉकआउट: टीएमसी बागी सांसदों को बुलाने पर कांग्रेस, सपा और 'आप' भड़के
सारांश
मुख्य बातें
मानसून सत्र की पूर्व संध्या पर 19 जुलाई को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक उस समय विवादों में घिर गई जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कथित बागी सांसदों को आमंत्रित किए जाने के विरोध में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), आम आदमी पार्टी (AAP), DMK, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वामपंथी दलों और शिवसेना (UBT) समेत कई विपक्षी दलों ने एकजुट होकर बैठक से वॉकआउट कर दिया। यह घटनाक्रम संसद सत्र की शुरुआत से पहले ही सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का संकेत दे रहा है।
विवाद की जड़: किसे मिला निमंत्रण?
TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने पत्रकारों को बताया कि लोकसभा टेबल ऑफिस की आधिकारिक सूची में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद दर्ज हैं, फिर भी संसदीय कार्य मंत्री ने पार्टी के 20 कथित बागी सांसदों को बैठक में आमंत्रित किया। मोइत्रा ने सवाल उठाया कि किस संवैधानिक या संसदीय आधार पर इन सांसदों को एक अलग गुट के रूप में मान्यता दी गई।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इन सांसदों के किसी भी संभावित विलय को लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी नहीं मिली है और उनके खिलाफ दायर 20 अयोग्यता याचिकाएँ अभी भी लंबित हैं। मोइत्रा ने यह भी रेखांकित किया कि संविधान के 91वें संशोधन के पश्चात किसी अलग गुट को स्वतंत्र मान्यता देने का कोई प्रावधान नहीं है।
कांग्रेस और सपा की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने वॉकआउट को संवैधानिक दायित्व बताया। उनका कहना था कि कांग्रेस ने AAP, TMC और शिवसेना (UBT) के समर्थन में और संविधान की रक्षा के लिए यह कदम उठाया। तिवारी ने कहा कि किसी भी मामले में अंतिम निर्णय आने से पहले कोई निष्कर्ष निकालना पूरी तरह असंवैधानिक है।
समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि बैठक में आधिकारिक TMC सांसदों की सूची से पहले बागी सांसदों की सूची दिखाई गई, जिसे उन्होंने सरकार का अलोकतांत्रिक कदम करार दिया।
JMM की चिंता: दल-तोड़ राजनीति और परिसीमन
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की सांसद महुआ माजी ने वॉकआउट का समर्थन करते हुए कहा कि देश में विभिन्न तरीकों से सांसदों को लालच देकर राजनीतिक दलों को सुनियोजित ढंग से तोड़ा जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र में बगावत करने वाले सांसदों को भी इसी बैठक में बुलाया गया, जबकि लोकसभा अध्यक्ष ने अभी तक उन्हें मान्यता नहीं दी है।
माजी ने परिसीमन के मुद्दे पर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि यदि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाता है तो झारखंड जैसे राज्यों में अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों का काफी नुकसान होगा। उन्होंने शर्त रखी कि यदि सरकार यह आश्वासन दे कि किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं होंगी और सभी विपक्षी दल सहमत हों, तो JMM अपने रुख पर पुनर्विचार कर सकती है।
आगे क्या होगा
मानसून सत्र की शुरुआत से पहले हुए इस टकराव ने संसद में सहज कामकाज की संभावनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी एकता का यह प्रदर्शन बताता है कि सत्र के दौरान टीएमसी बागी मुद्दा, परिसीमन और दल-विरोधी गतिविधियाँ प्रमुख विवाद बिंदु बने रहेंगे। अयोग्यता याचिकाओं पर लोकसभा अध्यक्ष का अगला कदम इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा।