19 जुलाई 2026
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सौगत रॉय का लोकसभा अध्यक्ष से सवाल: अयोग्यता याचिका लंबित, फिर टीएमसी बागी सांसदों को अलग सीट क्यों?

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सौगत रॉय का लोकसभा अध्यक्ष से सवाल: अयोग्यता याचिका लंबित, फिर टीएमसी बागी सांसदों को अलग सीट क्यों?

सारांश

मानसून सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में टीएमसी और विपक्ष ने वॉकआउट किया। सौगत रॉय का सवाल — जब 20 बागी सांसदों पर अयोग्यता याचिका लंबित है, तो उन्हें अलग सीट और आमंत्रण क्यों? यह विवाद मानसून सत्र की शुरुआत से पहले ही संसदीय माहौल को तनावपूर्ण बना रहा है।

मुख्य बातें

टीएमसी के सांसद सौगत रॉय ने 19 जुलाई 2026 को सर्वदलीय बैठक में लोकसभा अध्यक्ष पर सवाल उठाए।
टीएमसी के 20 बागी सांसद नेशनल कांग्रेस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हुए, जिनके खिलाफ अयोग्यता याचिका लंबित है।
संसदीय कार्य मंत्रालय ने बागी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया, जिस पर टीएमसी ने आपत्ति जताई।
संतोष कुमार और सीपीआई(एम) के जॉन ब्रिटास ने भी लोकसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
विपक्षी दलों ने एकजुट होकर बैठक से वॉकआउट किया।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने 19 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में आयोजित सर्वदलीय बैठक के बाहर लोकसभा अध्यक्ष पर तीखे सवाल दागे। रॉय ने पूछा कि जब टीएमसी के 20 बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिका अध्यक्ष के समक्ष लंबित है, तो उन्हें संसद में अलग बैठने की व्यवस्था और सर्वदलीय बैठक में आमंत्रण क्यों दिया गया। मानसून सत्र से ठीक पहले बुलाई गई इस बैठक से विपक्षी दलों ने वॉकआउट कर सरकार और अध्यक्ष के रवैये पर कड़ा विरोध दर्ज कराया।

विवाद की जड़: बागी सांसद और एनसीपीआई

टीएमसी के 20 सांसद पार्टी से अलग होकर नेशनल कांग्रेस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए हैं। इन सांसदों की सदस्यता को लेकर टीएमसी ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता याचिका दायर कर रखी है, जो अभी भी लंबित है।

सौगत रॉय ने पत्रकारों से कहा, 'यह फैसला अध्यक्ष को करना है। हमने उनके समक्ष अयोग्यता की याचिका दायर कर रखी है।' उन्होंने यह भी दावा किया कि देर रात तक लोकसभा अध्यक्ष ने बागी सांसदों के गुट को अलग राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं दी थी।

सर्वदलीय बैठक में आमंत्रण पर आपत्ति

टीएमसी की आपत्ति का दूसरा बड़ा बिंदु यह रहा कि संसदीय कार्य मंत्रालय ने बागी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया। सौगत रॉय ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'हम इसका विरोध करते हैं और आगे भी विरोध करेंगे।'

उन्होंने आरोप लगाया कि जिस गुट को अभी तक कोई संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है, उसे सर्वदलीय बैठक में बुलाना इस परंपरागत मंच की गरिमा और विश्वसनीयता के विरुद्ध है।

विपक्ष का वॉकआउट और व्यापक आलोचना

इस मुद्दे पर नाराज़गी जताते हुए विपक्षी दलों ने एकजुट होकर बैठक से वॉकआउट किया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के सांसद पी. संतोष कुमार ने कहा कि यह वॉकआउट लोकसभा अध्यक्ष और संसदीय कार्य मंत्री के रवैये के विरोध में था। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल राजनीतिक दलों में दलबदल को बढ़ावा दे रहा है, जो लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई(एम)] के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने भी सरकार और अध्यक्ष की आलोचना की। ब्रिटास ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका निष्पक्ष संरक्षक के बजाय सत्तारूढ़ दल के हितों के अनुरूप दिखाई दे रही है। उनके अनुसार, संसद की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जुड़ी संस्थागत परंपराएँ कमज़ोर पड़ रही हैं।

संवैधानिक और संसदीय पहलू

गौरतलब है कि दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत अयोग्यता याचिका लंबित होने की स्थिति में संबंधित सांसदों की संसदीय हैसियत विवादास्पद बनी रहती है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी बड़े दल के टूट के बाद सांसदों की मान्यता को लेकर विवाद उभरा हो — इससे पहले भी महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में इसी तरह के मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे हैं।

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है और विपक्ष पहले से ही कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। आगे देखना होगा कि लोकसभा अध्यक्ष अयोग्यता याचिका पर कब और क्या निर्णय लेते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि दसवीं अनुसूची की व्यावहारिक कमज़ोरी का प्रतिबिंब है — जहाँ अयोग्यता याचिकाएँ वर्षों तक लंबित रह सकती हैं और इस बीच 'बागी' सांसद संसदीय सुविधाएँ भोगते रहते हैं। लोकसभा अध्यक्ष का यह कदम — बिना मान्यता दिए भी अलग व्यवस्था करना — एक ऐसी मिसाल बनाता है जो भविष्य में हर बड़े दल-विभाजन में इस्तेमाल हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 के महाराष्ट्र फैसले में स्पष्ट किया था कि अध्यक्ष को समयबद्ध तरीके से याचिकाओं पर निर्णय लेना चाहिए — लेकिन उस निर्देश का पालन अब भी अधूरा है। मानसून सत्र शुरू होने से पहले यह टकराव संसदीय कार्यवाही को और जटिल बना सकता है।
RashtraPress
19 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सौगत रॉय ने लोकसभा अध्यक्ष से क्या सवाल पूछा?
सौगत रॉय ने पूछा कि जब टीएमसी के 20 बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिका लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित है, तो उन्हें संसद में अलग बैठने की व्यवस्था और सर्वदलीय बैठक में आमंत्रण क्यों दिया गया। उनका तर्क था कि जब तक अध्यक्ष इस याचिका पर निर्णय नहीं लेते, बागी सांसदों की संसदीय हैसियत विवादास्पद बनी रहती है।
टीएमसी के बागी सांसद कौन हैं और वे किस पार्टी में गए?
टीएमसी के 20 सांसद पार्टी से अलग होकर नेशनल कांग्रेस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए हैं। इनमें सुदीप बंद्योपाध्याय का नाम प्रमुख रूप से सामने आया है, जिन्हें संसदीय कार्य मंत्रालय ने सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया था।
विपक्ष ने सर्वदलीय बैठक से वॉकआउट क्यों किया?
विपक्षी दलों ने इसलिए वॉकआउट किया क्योंकि संसदीय कार्य मंत्रालय ने एक ऐसे गुट के सांसद को बैठक में बुलाया जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने अलग राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं दी थी। सीपीआई और सीपीआई(एम) के सांसदों ने भी इसे संसदीय परंपरा और गरिमा के विरुद्ध बताया।
दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता याचिका का क्या महत्व है?
दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत यदि कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है। याचिका लंबित रहने के दौरान संबंधित सांसदों की संवैधानिक हैसियत अनिश्चित रहती है, और इसी आधार पर टीएमसी ने बागी सांसदों को किसी भी आधिकारिक मंच पर मान्यता देने का विरोध किया है।
मानसून सत्र पर इस विवाद का क्या असर पड़ सकता है?
यह विवाद मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही विपक्ष और सरकार के बीच तनाव बढ़ा चुका है। विपक्षी दल पहले से ही कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में हैं, और इस वॉकआउट से संकेत मिलता है कि सत्र में कार्यवाही सुचारु चलाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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