30 जुलाई 2026
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TMC बागी सांसदों ने NCPI क्यों चुनी: पार्टी संविधान और BJP रणनीति की दो बड़ी वजहें

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TMC बागी सांसदों ने NCPI क्यों चुनी: पार्टी संविधान और BJP रणनीति की दो बड़ी वजहें

सारांश

TMC बागी सांसदों ने लोकसभा में पार्टी पर कब्जे की कोशिश छोड़ त्रिपुरा की निष्क्रिय NCPI को क्यों चुना? पार्टी का संविधान और BJP की कथित रणनीति — दो कारण जो इस अप्रत्याशित राजनीतिक मोड़ को समझाते हैं।

मुख्य बातें

TMC बागी सांसदों ने लोकसभा में संसदीय पार्टी पर कब्जे की बजाय त्रिपुरा की NCPI में शामिल होने का फैसला किया।
TMC के पार्टी संविधान में राष्ट्रीय कार्यसमिति को सर्वोच्च निर्णायक संस्था का दर्जा है, जो ममता बनर्जी के नियंत्रण में मानी जाती है।
पार्टी संविधान के कारण बागियों के लिए चुनाव चिह्न और पार्टी फंड पर दावा करना व्यावहारिक रूप से असंभव था।
CPM सांसद विकास रंजन भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि इस योजना के पीछे BJP और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का हाथ है।
ममता बनर्जी ने बागी गुट बनते ही सभी पुरानी आंतरिक कमेटियाँ भंग कर नई वफादार कमेटियाँ गठित कर दीं।
विधानसभा में 80 में से 60 विधायकों का समर्थन मिलने के बावजूद लोकसभा में यही रणनीति संभव नहीं थी।

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों ने 15 जून 2026 को एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए लोकसभा में TMC की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की रणनीति छोड़ दी और इसके बजाय त्रिपुरा स्थित राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय दल 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में शामिल होने का निर्णय लिया। राजनीतिक विश्लेषकों और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इस रणनीतिक बदलाव के पीछे दो ठोस कारण हैं।

TMC के पार्टी संविधान की बाधा

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पहला और सबसे बड़ा कारण तृणमूल कांग्रेस का पार्टी संविधान है, जैसा कि वह भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में दर्ज है। मूल संविधान में पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक संस्था राज्य कार्यकारी समिति को माना गया था, लेकिन बाद में संशोधन के बाद यह दर्जा राष्ट्रीय कार्यसमिति को दे दिया गया।

यह राष्ट्रीय कार्यसमिति काफी हद तक पार्टी अध्यक्ष एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द केंद्रित मानी जाती है। पार्टी के दोनों संविधानों — मूल और संशोधित — में संगठनात्मक पदाधिकारियों का प्रभाव चुने हुए जनप्रतिनिधियों, यानी सांसदों और विधायकों, से अधिक माना गया है। इसी कारण बागी सांसदों के लिए चुनाव चिह्न और पार्टी फंड पर दावे की राह व्यावहारिक रूप से बंद थी।

एक राजनीतिक जानकार ने कहा, "चूँकि राष्ट्रीय कार्यसमिति और संगठन के पदाधिकारी प्रत्यक्ष रूप से ममता बनर्जी तथा अप्रत्यक्ष रूप से उनके भतीजे और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के प्रभाव में माने जाते हैं, इसलिए बागी सांसदों के लिए लंबे समय में TMC की संसदीय पार्टी, चुनाव चिह्न या पार्टी फंड पर नियंत्रण हासिल करना मुश्किल होता। यही वजह है कि बागियों ने अंतिम समय में अपनी रणनीति बदली।"

BJP की कथित भूमिका और रणनीतिक हित

दूसरा प्रमुख कारण भारतीय जनता पार्टी (BJP) की कथित भूमिका है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि इस पूरी योजना के पीछे BJP का हाथ है। उनके अनुसार, नई दिल्ली में वरिष्ठ BJP नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बागी सांसदों की कई बैठकें इस संकेत को पुष्ट करती हैं।

भट्टाचार्य ने कहा, "BJP का मुख्य उद्देश्य संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए बागी TMC सांसदों का समर्थन हासिल करना है। इसलिए पार्टी ने कोई जोखिम नहीं उठाया और लोकसभा में TMC की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश जारी रखने के बजाय, बागी सांसदों को किसी नई पार्टी में शामिल कराने की रणनीति अपनाई।" गौरतलब है कि BJP ने इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

विधानसभा बनाम लोकसभा: रणनीति में अंतर क्यों

एक स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में 80 में से 60 विधायकों के समर्थन से बहुमत वाला बागी गुट बनाने की कोशिश सफल रही, तो लोकसभा में ऐसा ही प्रयास क्यों नहीं किया गया?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इसका जवाब ममता बनर्जी की त्वरित प्रतिक्रिया में छिपा है। बागी गुट बनने के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने पार्टी की सभी पुरानी आंतरिक कमेटियों और TMC से जुड़े जन-संगठनों की आंतरिक कमेटियों को भंग करने की घोषणा की। इसके बाद उन्होंने अपने और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार नेताओं के साथ नई कमेटियाँ बनाईं।

एक जानकार ने बताया, "इस तरह लोकसभा में अपनी संसदीय टीम और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी विधायी टीम पर नियंत्रण खोने के बावजूद ममता बनर्जी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति पर अपना नियंत्रण बनाए हुए हैं।" यह ऐसे समय में आया है जब TMC पहले से ही आंतरिक दबावों से जूझ रही है।

आगे क्या होगा

NCPI में शामिल होने के बाद बागी सांसदों की संसदीय स्थिति और दलबदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता को लेकर कानूनी प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष दायर याचिकाएँ इस मामले की अगली दिशा तय करेंगी। TMC के भीतर इस विभाजन का असर 2026 के पश्चिम बंगाल राजनीतिक परिदृश्य पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

BJP पर लगे आरोप — यदि सत्य हैं — तो यह दर्शाते हैं कि सत्तारूढ़ दल विपक्षी पार्टियों के भीतर विभाजन को संसदीय लाभ के लिए कैसे भुनाता है। मुख्यधारा की कवरेज इस कानूनी और संवैधानिक पहलू को अक्सर नजरअंदाज करती है, जबकि असली कहानी यहीं है।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

TMC बागी सांसदों ने NCPI में शामिल होने का फैसला क्यों किया?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, TMC के पार्टी संविधान में राष्ट्रीय कार्यसमिति को सर्वोच्च निर्णायक संस्था का दर्जा है जो ममता बनर्जी के नियंत्रण में है, इसलिए बागियों के लिए चुनाव चिह्न या पार्टी फंड पर दावा करना व्यावहारिक रूप से असंभव था। इसी कारण उन्होंने त्रिपुरा की NCPI को विकल्प के रूप में चुना।
TMC के पार्टी संविधान ने बागी सांसदों की रणनीति को कैसे प्रभावित किया?
TMC के संविधान में मूल रूप से राज्य कार्यकारी समिति सर्वोच्च थी, लेकिन बाद के संशोधन में राष्ट्रीय कार्यसमिति को यह दर्जा मिला जो ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द केंद्रित है। इसके अलावा, संगठनात्मक पदाधिकारियों का प्रभाव सांसदों-विधायकों से अधिक माना गया है, जिससे बागियों के लिए पार्टी पर नियंत्रण असंभव था।
क्या BJP की इस मामले में कोई भूमिका है?
CPM के राज्यसभा सदस्य विकास रंजन भट्टाचार्य ने आरोप लगाया है कि नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बागी सांसदों की कई बैठकें हुईं, जो BJP की कथित भूमिका की ओर इशारा करती हैं। BJP ने इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
विधानसभा में सफल रणनीति लोकसभा में क्यों नहीं अपनाई गई?
पश्चिम बंगाल विधानसभा में 80 में से 60 विधायकों का समर्थन मिलने के बाद ममता बनर्जी ने तत्काल सभी पुरानी आंतरिक कमेटियाँ भंग कर वफादार नेताओं के साथ नई कमेटियाँ बनाईं। इससे लोकसभा में भी वही रणनीति अपनाना बागियों के लिए व्यर्थ हो गया क्योंकि राष्ट्रीय कार्यसमिति पर ममता का नियंत्रण बना रहा।
NCPI क्या है और इसे क्यों चुना गया?
नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) त्रिपुरा स्थित एक राजनीतिक दल है जिसे राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय माना जाता है। बागी सांसदों ने इसे इसलिए चुना क्योंकि TMC पर कब्जे की कोशिश के बजाय किसी नई पार्टी में शामिल होना कानूनी और राजनीतिक रूप से कम जोखिम भरा विकल्प था।
राष्ट्र प्रेस
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