TMC विवाद: चुनाव आयोग की 6 जुलाई की डेडलाइन से पहले ममता खेमे ने तैयार किए दो मजबूत तर्क
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर गहराते संगठनात्मक संकट के बीच चुनाव आयोग (ECI) ने 2 जुलाई को दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को पत्र जारी कर 6 जुलाई तक संगठनात्मक चुनावों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के विवाद पर अपना पक्ष रखने को कहा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला मूल गुट अब ऋतब्रत बनर्जी खेमे के दावों का खंडन करने के लिए दो सुनिश्चित कानूनी तर्कों पर भरोसा कर रहा है।
पहला तर्क: उम्मीदवारी और टिकट का आधार
ममता बनर्जी खेमे के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पहला तर्क उन बागी विधायकों की कानूनी स्थिति से जुड़ा है, जिन्हें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर ममता बनर्जी की स्वीकृति और हस्ताक्षर से तृणमूल कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया गया था।
ममता खेमे से जुड़े एक विधायक ने कहा, 'इन विधायकों ने — जिनमें ऋतब्रत बनर्जी भी शामिल हैं — ममता बनर्जी की ओर से नामित किए जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस के टिकट और चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा और जीता, इसलिए वे बाद में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा नहीं कर सकते।' यह तर्क अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के प्रश्न को भी सीधे प्रभावित करता है।
दूसरा तर्क: नई राष्ट्रीय कार्यसमिति की वैधता पर सवाल
ममता बनर्जी गुट का दूसरा तर्क बागी खेमे की ओर से पिछले महीने घोषित नई राष्ट्रीय कार्यसमिति की वैधता को चुनौती देता है, जिसमें ममता बनर्जी की जगह विधायक अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था।
ममता खेमे के एक विधायक ने स्पष्ट किया, 'फरवरी 2022 के अधिवेशन में ममता बनर्जी को आजीवन पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष फिर से चुना गया था, जिसमें न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि भारत के अन्य राज्यों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। इसलिए, राज्य विधानसभा में संख्या बल के आधार पर घोषित नई राष्ट्रीय कार्यसमिति वैध नहीं हो सकती।' गौरतलब है कि बागी गुट का पूरा दावा पश्चिम बंगाल विधानसभा में उनके संख्या-बल पर टिका है, जबकि ममता खेमा इसे राष्ट्रीय संगठन के संदर्भ में अपर्याप्त बताता है।
निष्कासन का मुद्दा: तीसरा पहलू
ममता खेमे की ओर से यह भी रेखांकित किया जाएगा कि ऋतब्रत बनर्जी को मौजूदा चुनौती शुरू करने से पहले ही पार्टी से निष्कासित किया जा चुका था। खेमे के एक विधायक ने तर्क दिया, 'हमारा सवाल यह है कि एक निष्कासित विधायक और उनके समर्थकों की टीम पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा कैसे कर सकती है।'
ऋतब्रत गुट का पक्ष
2 जुलाई को ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के सामने पेश हुआ और तर्क दिया कि संख्या-बल में बहुमत होने के कारण पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर नियंत्रण का अधिकार उनका है। पत्रकारों से बात करते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने कहा था कि पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर अलग से कोई माँग करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि गुट के पास संख्या-बल का बहुमत है, जिससे उनका दावा पहले ही साबित हो जाता है।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब TMC का यह आंतरिक विभाजन पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ बन सकता है। 6 जुलाई की समय-सीमा के बाद चुनाव आयोग दोनों पक्षों के तर्कों की समीक्षा करेगा और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न पर अधिकार का निर्धारण करेगा — एक फैसला जो बंगाल की राजनीतिक दिशा को गहराई से प्रभावित कर सकता है।