TMC के 20 बागी सांसद NCPI में शामिल, मानसून सत्र में नई पार्टी की संसदीय एंट्री तय
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों के विलय के बाद नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) ने 15 जुलाई को सोशल मीडिया पर अपनी संसदीय पार्टी के नेताओं को बधाई दी और खुद को लोकसभा की एक उभरती ताकत के रूप में पेश किया। पार्टी का दावा है कि 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में वह पहली बार केंद्रीय राजनीति में औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराएगी।
नेतृत्व की घोषणा
NCPI ने अपनी संसदीय पार्टी के लिए नेतृत्व तय कर लिया है। सुदीप बंद्योपाध्याय को लोकसभा में पार्टी का फ्लोर लीडर, शताब्दी रॉय को उपनेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) नियुक्त किया गया है। दल-बदल के बाद बंद्योपाध्याय ने कहा कि अब वे संसद में 'असली तृणमूल' का प्रतिनिधित्व करेंगे और इसकी शुरुआत मानसून सत्र से होगी।
NCPI की पृष्ठभूमि
कोलकाता में मुख्यालय वाली NCPI अब तक राष्ट्रीय राजनीति में लगभग अज्ञात रही है। पार्टी ने एक भी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में उसे केवल 822 वोट मिले थे। फिर भी, पिछले महीने TMC के 20 सांसदों के NCPI में विलय की घोषणा के बाद यह पार्टी अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई।
संसदीय गणित और NDA में स्थान
इन सांसदों के शामिल होने के बाद NCPI का दावा है कि वह लोकसभा की पाँचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बाद दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी है। तुलना के लिए, NDA के अन्य प्रमुख सहयोगियों — आंध्र प्रदेश की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के 16 और बिहार की जनता दल (यूनाइटेड) के 12 सांसद हैं। NCPI के सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर नई संसदीय पार्टी को मान्यता देने और NDA को समर्थन देने की घोषणा की है।
दल-बदल कानून पर कानूनी पेच
यह घटनाक्रम एक जटिल कानूनी प्रश्न को जन्म देता है। बागी सांसदों का तर्क है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 के तहत उन्हें सुरक्षा मिलती है, जिसके अनुसार किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद यदि विलय के पक्ष में हों तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। हालाँकि, कानूनी विशेषज्ञों की राय इस पर बँटी हुई है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रावधान में 'पार्टी' का अर्थ केवल सांसदों का समूह नहीं, बल्कि समूची राजनीतिक पार्टी है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे 'शेल पार्टी' की रणनीति करार दिया है, जिसमें एक छोटी और अज्ञात पार्टी का उपयोग कानूनी सुरक्षा के लिए किया जाता है।
TMC का विरोध और मान्यता का इंतजार
TMC के महासचिव एवं सांसद अभिषेक बनर्जी पहले ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलकर इस विलय को अवैध बताते हुए बागी सांसदों को दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित करने की माँग कर चुके हैं। अब तक लोकसभा अध्यक्ष ने NCPI की संसदीय पार्टी को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है और लोकसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर अभी भी TMC के 28 सांसद दर्ज हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और मतदाताओं के जनादेश को लेकर व्यापक बहस भी छेड़ दी है। NCPI के सांसदों को भरोसा है कि जाँच के बाद उन्हें मान्यता मिलेगी और उन्होंने अपनी नई संसदीय पार्टी की बैठक भी बुलाई है। अब सबकी निगाहें 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र पर टिकी हैं।