तृणमूल के 20 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का प्रस्ताव लोकसभा स्पीकर को सौंपा, एनडीए को समर्थन का ऐलान
सारांश
मुख्य बातें
लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी और बहुमत वाले गुट के 20 सांसदों ने 14 जून 2026 को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर त्रिपुरा स्थित नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने का औपचारिक प्रस्ताव सौंपा। इस गुट की अगुवाई चार बार लोकसभा सांसद रहीं डॉ. काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय कर रही हैं।
मुख्य घटनाक्रम
बागी सांसदों ने शुरुआत में लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक अलग गुट बनाने के संकेत दिए थे — ठीक वैसे ही जैसा पश्चिम बंगाल विधानसभा में किया गया था। हालांकि, रविवार 14 जून को उन्होंने यह रणनीति बदलते हुए सीधे NCPI में विलय का मार्ग चुना और इसकी औपचारिक सूचना लोकसभा स्पीकर को पत्र के ज़रिए दी।
इस निर्णय की पुष्टि करते हुए डॉ. काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में NDA के साथ देश के हित में काम करेंगी।
एनसीपीआई: एक परिचय
नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) की स्थापना 2022 में हुई थी। पार्टी के कार्यालय फिलहाल असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में हैं। कोलकाता से सटे हावड़ा ज़िले के बांकरा में भी इसका एक दफ्तर है। बांकुरा से तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसद अरूप चक्रवर्ती ने मीडिया को बताया कि NCPI जल्द ही पूरे पश्चिम बंगाल में अपने कार्यालय खोलेगी।
तृणमूल कांग्रेस की प्रतिक्रिया
इन घटनाक्रमों के बीच, तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को अलग से पत्र लिखकर आग्रह किया कि पार्टी के भीतर किसी भी नए गुट को मान्यता न दी जाए। उनका तर्क था कि पार्टी के निर्वाचित सांसद उस पार्टी के नीतिगत निर्णयों से स्वतंत्र होकर कार्य नहीं कर सकते जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश कर रही है और लोकसभा में इस विभाजन को पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
राजनीतिक असर और आगे की राह
गौरतलब है कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत यदि किसी दल के दो-तिहाई सांसद एक साथ किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिलती है। 20 सांसदों का यह गुट NCPI में विलय के इस कानूनी मार्ग का उपयोग करने की कोशिश में है। लोकसभा स्पीकर के निर्णय पर अब सभी की नज़रें टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला लोकसभा में शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है।