तृणमूल कांग्रेस ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को निष्कासित किया, हस्ताक्षर जालसाजी विवाद के बीच बड़ा फैसला
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने सोमवार, 1 जून 2026 को उलुबेरिया पुरबा के विधायक ऋतब्रत बनर्जी और एंटाली के विधायक संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया। निष्कासन की सूचना दोनों विधायकों को ईमेल और व्हाट्सएप के ज़रिए दी गई और पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बसु को भी आधिकारिक रूप से अवगत कराया गया। यह कार्रवाई विधानसभा हस्ताक्षर जालसाजी विवाद के बीच हुई, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए तूफान की वजह बन गई है।
निष्कासन की पृष्ठभूमि
यह घटनाक्रम राज्य के पुलिस मंत्री सुवेंदु अधिकारी की नबन्ना स्थित राज्य सचिवालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के महज़ 15 मिनट बाद सामने आया। अधिकारी ने उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा किया था कि तृणमूल के इन्हीं दोनों विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को विधानसभा हस्ताक्षर जालसाजी मामले में लिखित शिकायत सौंपी थी। इसी शिकायत के आधार पर विधानसभा सचिवालय ने हरे स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज कराई। अधिकारी ने बताया कि मामला संज्ञान में आने के बाद उन्होंने राज्य के आपराधिक जांच विभाग (CID) को जांच में शामिल होने का निर्देश दिया।
तृणमूल का आधिकारिक रुख
तृणमूल कांग्रेस ने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया कि दोनों विधायकों को तीन कारणों से निष्कासित किया गया — पार्टी नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों में अनुपस्थिति, पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्तता, और पार्टी के विरुद्ध सार्वजनिक बयानबाज़ी। पार्टी ने हस्ताक्षर विवाद को आधिकारिक कारण के रूप में नहीं बताया, हालांकि समय-क्रम स्पष्ट संकेत देता है।
निष्कासित विधायकों की प्रतिक्रिया
निष्कासन के बाद संदीपन साहा ने कहा कि पार्टी अनैतिक कार्यों का समर्थन करती है और नैतिक आचरण करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाती है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें यह नहीं पता था कि उपस्थिति पत्र पर हस्ताक्षर करना किसी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर के समान माना जाएगा। गौरतलब है कि ऋतब्रत बनर्जी के लिए पार्टी से निष्कासन कोई नया अनुभव नहीं है — 2017 में सीपीआई(एम) ने भी उन्हें विभिन्न आरोपों के चलते निष्कासित किया था, जिसके बाद वे तीन वर्षों तक राज्यसभा में स्वतंत्र सांसद रहे। आरजी कर दुष्कर्म और हत्याकांड के बाद जवाहर सरकार के इस्तीफे के बाद ऋतब्रत तृणमूल के टिकट पर डेढ़ साल के लिए राज्यसभा पहुँचे। इस वर्ष उन्होंने तृणमूल के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता।
पार्टी प्रवक्ता की तीखी टिप्पणी
निष्कासन के तुरंत बाद बेलियाघाटा के विधायक और तृणमूल प्रवक्ता कुणाल घोष ने फेसबुक पर एक विस्तृत पोस्ट लिखी, जिसमें उन्होंने नाम लिए बिना कहा कि चुनाव परिणाम घोषित हुए एक महीना भी नहीं बीता और पार्टी में बगावत और विश्वासघात शुरू हो गया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पार्टी के खिलाफ आरोप थे तो चुनाव क्यों लड़ा गया। उन्होंने इस आचरण को 'कायरता' करार दिया।
हस्ताक्षर जालसाजी विवाद और CID जांच
यह पूरा प्रकरण उस विवाद से जुड़ा है जो 4 मई के चुनाव परिणामों के बाद उपजा। 6 मई को ममता बनर्जी के कालीघाट आवास पर हुई विधायक बैठक में पार्टी नेता, उपनेता और मुख्य सचेतक तय करने का अधिकार ममता बनर्जी को सौंपा गया। इसके बाद तृणमूल ने शोवनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता, नयना बंद्योपाध्याय और असीमा पात्रा को उपनेता, और फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक घोषित किया। पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी का पत्र विधानसभा ने इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि संसदीय दल की विधिवत बैठक में चुनाव नहीं हुआ। 19 मई की अगली बैठक में विधायकों से 6 मई की बैठक के कार्यवृत्त पर हस्ताक्षर कराए गए, जिसे लेकर कई विधायकों ने दबाव का आरोप लगाया। CID ने जांच शुरू करते हुए नयना बंद्योपाध्याय, कुणाल घोष, तापस मैती और बहारुल इस्लाम के घरों का दौरा किया।
आगे की राह
नियमों के अनुसार, तृणमूल से निष्कासन के बाद दोनों विधायक 'गैर-दलीय' सदस्य बने रहेंगे और पार्टी व्हिप या निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं होंगे। तृणमूल अलग से उनकी विधायक सदस्यता रद्द करने के लिए आवेदन नहीं कर सकती। पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह विवाद अभी और गहरा होने के संकेत दे रहा है।