विजेंद्र गुप्ता का आह्वान: विश्वविद्यालय बनें सार्वजनिक नीति के सक्रिय भागीदार
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली विधानसभा के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने 22 अगस्त 2026 को फरीदाबाद में आयोजित 'वाइस चांसलर्स कॉन्क्लेव 2026' के उद्घाटन सत्र में स्पष्ट किया कि प्रभावी कानून-निर्माण के लिए सटीक तथ्यों, विश्वसनीय शोध और जमीनी साक्ष्यों की अनिवार्यता है, और देश के विश्वविद्यालयों को यह जानकारी विधानसभाओं तथा सरकारों तक पहुँचाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। फरीदाबाद के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज में आयोजित इस दो दिवसीय कॉन्क्लेव (22-23 अगस्त) की थीम 'ग्रीन कैंपस: टिकाऊ और मजबूत भविष्य के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों को सशक्त बनाना' रखी गई थी।
विधायिका और विश्वविद्यालय: पूरक भूमिकाएँ
गुप्ता ने रेखांकित किया कि विधायिकाएँ कानून बनाती हैं, बजट को स्वीकृति देती हैं और सरकारों को जवाबदेह ठहराती हैं। उनका कहना था कि विश्वविद्यालय शोध-आधारित इनपुट, पर्यावरण कानूनों पर विशेषज्ञ मत और लोकतांत्रिक संस्थाओं में छात्रों की व्यापक भागीदारी के माध्यम से इस पूरी प्रक्रिया को और सुदृढ़ बना सकते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब देश में उच्च शिक्षा की नई राष्ट्रीय नीति के क्रियान्वयन को लेकर विमर्श जारी है और विश्वविद्यालयों से नीति-निर्माण में योगदान की अपेक्षाएँ बढ़ रही हैं।
जलवायु संकट: दिल्ली-NCR की ज़मीनी हकीकत
जलवायु परिवर्तन को 'आज की सच्चाई' बताते हुए स्पीकर गुप्ता ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में रिकॉर्ड गर्मी, सर्दियों में घना स्मॉग, वायु प्रदूषण, अचानक आने वाली बाढ़ और तेज़ी से गिरते भूजल स्तर का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि यमुना की दुर्दशा, वायु गुणवत्ता का संकट और भूजल की कमी केवल पर्यावरणीय चिंताएँ नहीं हैं — ये सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़े गहरे सवाल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून और नीतियाँ आवश्यक हैं, किंतु स्थिरता को मूल्यों, आदतों और जीवनशैली का अभिन्न अंग भी बनाना होगा।
विश्वविद्यालयों की तीन अहम भूमिकाएँ
गुप्ता ने भारत के 'ग्रीन ट्रांजिशन' में विश्वविद्यालयों की तीन केंद्रीय भूमिकाएँ रेखांकित कीं — मॉडल के रूप में, शिक्षक के रूप में, और शोध व समाधान के केंद्र के रूप में।
उन्होंने कहा, 'आपके कैंपस हमारी प्रयोगशालाएँ हैं।' उनका तर्क था कि कैंपस पर सफल हरित मॉडल नीति-निर्माताओं को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें दोहराने का आत्मविश्वास दे सकते हैं।
गुप्ता ने यह भी कहा कि जो छात्र चार-पाँच वर्षों तक टिकाऊ आदतें अपनाते हैं, वे उन्हें अपने कार्यस्थलों, उन गाँवों या शहरों में जहाँ वे बसते हैं, और अपने परिवारों में भी ले जाते हैं — इस प्रकार एक कैंपस पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर सकता है।
एक्स पर संदेश और सवाल
गुप्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि एक हरित, अधिक टिकाऊ और भविष्य के लिए तैयार भारत को आकार देने में उच्च शिक्षा संस्थानों की अहम भूमिका है। उन्होंने जोड़ा कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार कैंपस बनाना, नवाचार को प्रोत्साहित करना और युवाओं को स्थिरता की सुदृढ़ समझ के साथ सशक्त बनाना एक मजबूत और विकसित राष्ट्र के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
उन्होंने सभा के समक्ष एक विचारोत्तेजक प्रश्न रखा — 'अगर भारत के विश्वविद्यालय ग्रीन नहीं होंगे, तो भारत का भविष्य ग्रीन कैसे हो सकता है?' — यह प्रश्न देश के उच्च शिक्षा परिदृश्य की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है।