उन्नाव रेप केस: सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सेंगर की जमानत वाला हाईकोर्ट आदेश रद्द किया, 3 महीने में नए फैसले के निर्देश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 15 मई 2026 को उन्नाव रेप केस में एक अहम फैसला सुनाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पूर्व भारतीय जनता पार्टी (BJP) विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा पर रोक लगाकर उन्हें जमानत दी गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया और उच्च न्यायालय को तीन महीने के भीतर नए सिरे से फैसला सुनाने का निर्देश दिया।
मुख्य घटनाक्रम
दिसंबर 2025 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेंगर की उम्रकैद की सजा पर रोक लगाते हुए उन्हें जमानत प्रदान की थी। इस फैसले के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। इसके तत्काल बाद सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसने उसी माह हाईकोर्ट के जमानत आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी और सेंगर व उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया था।
शुक्रवार को सुनाए गए फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कई ऐसे पहलू हैं जिन पर उच्च न्यायालय को गंभीरता से पुनर्विचार करना आवश्यक है। पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वह या तो सेंगर की सजा के विरुद्ध दाखिल अपील पर तीन महीने के भीतर अंतिम फैसला सुनाए, अथवा सजा पर रोक की अर्जी पर नया और विस्तृत आदेश जारी करे।
कुलदीप सेंगर का आपराधिक इतिहास
कुलदीप सिंह सेंगर को वर्ष 2019 में सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्नाव की एक नाबालिग पीड़िता से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह मामला उस समय राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया था जब पीड़िता और उसके परिवार ने सेंगर व उनके सहयोगियों पर लगातार धमकाने और उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे।
इसके अतिरिक्त, सेंगर पीड़िता के पिता की न्यायिक हिरासत में मौत से जुड़े एक अलग मामले में भी 10 वर्ष की सजा काट रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जनवरी 2026 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उस मामले में भी सजा पर रोक लगाने की उनकी दूसरी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि सेंगर का आपराधिक रिकॉर्ड गंभीर है और कोई नया आधार सामने नहीं आया है।
सरकार और न्यायिक प्रतिक्रिया
सीबीआई की ओर से दायर अपील में तर्क दिया गया था कि उच्च न्यायालय ने जमानत देते समय मामले की गंभीरता और पीड़िता के परिवार की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त किया।
गौरतलब है कि यह मामला न केवल न्यायिक प्रक्रिया की दृष्टि से बल्कि राजनीतिक जवाबदेही के सवाल पर भी देश में बहस का विषय रहा है। सेंगर उत्तर प्रदेश के बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे थे और दोषसिद्धि के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित किया गया था।
आम जनता पर असर
इस फैसले को महिला सुरक्षा और न्यायिक जवाबदेही के पैरोकारों ने राहत की दृष्टि से देखा है। दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट के जमानत आदेश के बाद महिला अधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध जताया था। सर्वोच्च न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस व्यापक चिंता को संज्ञान में लेता प्रतीत होता है।
क्या होगा आगे
अब दिल्ली उच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार तीन महीने के भीतर या तो अपील पर अंतिम फैसला सुनाना होगा या सजा पर रोक की अर्जी पर नया आदेश जारी करना होगा। तब तक सेंगर की जमानत प्रभावी नहीं होगी और वे जेल में ही रहेंगे। यह मामला एक बार फिर देश में बलात्कार पीड़ितों के लिए न्याय की गति और उपलब्धता पर बहस को केंद्र में ले आया है।