यूपीआई शुल्क पर सीपीआई का विरोध: केंद्र सरकार से तत्काल वापसी की माँग
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने 16 सितंबर 2026 को यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के फैसले की कड़ी निंदा की और इसे तत्काल वापस लेने की माँग की। पार्टी का कहना है कि यूपीआई एक सार्वजनिक डिजिटल भुगतान ढाँचा है, जिसे मूलत: आम नागरिकों की सुविधा के लिए बनाया गया था, और इसे शुल्क-आधारित व्यवस्था में तब्दील करना सीधे तौर पर जनविरोधी है।
सीपीआई का मुख्य तर्क
सीपीआई के राष्ट्रीय सचिवालय द्वारा जारी बयान में पार्टी ने स्वीकार किया कि सरकार यह दावा कर रही है कि उपभोक्ताओं पर सीधे कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। हालाँकि, पार्टी का तर्क है कि व्यावहारिक अनुभव यह बताता है कि व्यापारी ऐसे अतिरिक्त खर्चों का बोझ अंततः ग्राहकों पर डाल देते हैं। सीपीआई के अनुसार, ₹10 और ₹10,000 के लेनदेन को संसाधित करने की लागत में कोई विशेष अंतर नहीं होता, इसलिए राशि के आधार पर शुल्क तय करना तर्कसंगत नहीं है।
एनपीसीआई की वित्तीय स्थिति पर सवाल
पार्टी ने नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की आर्थिक सेहत का हवाला देते हुए कहा कि संस्था पहले से ही पर्याप्त नकद भंडार और निवेश से लैस है और उसने सरकार को करोड़ों रुपए कर के रूप में भी चुकाए हैं। सीपीआई का मानना है कि ऐसी स्थिति में यूपीआई को राजस्व-अर्जन का माध्यम बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है।
अमेरिकी दबाव का आरोप
सीपीआई ने आरोप लगाया कि इस निर्णय के पीछे अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि का दबाव काम कर रहा है, जिसने कथित तौर पर भारत की यूपीआई और शून्य एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) नीति को अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए बाधा बताया है। पार्टी का दावा है कि वीजा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों का हित कार्ड-आधारित भुगतान को बढ़ावा देने और यूपीआई तथा रुपे को कम प्रतिस्पर्धी बनाने में है। यह आरोप सरकार ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है।
₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर फोकस
सीपीआई ने रेखांकित किया कि ₹2,000 से अधिक के लेनदेन यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शनों के कुल मूल्य का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा हैं और इन्हीं पर शुल्क लगाने की तैयारी बताई जा रही है। यह ऐसे समय में आया है जब देश के डिजिटल भुगतान बाज़ार का बड़ा हिस्सा पहले से ही वॉलमार्ट-स्वामित्व वाली फोनपे और अल्फाबेट-स्वामित्व वाली गूगल पे के पास है, जो मिलकर लगभग 80 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन का संचालन करती हैं। सीपीआई का तर्क है कि बड़ी विदेशी कंपनियों से सार्वजनिक डिजिटल बुनियादी ढाँचे के उपयोग का उचित शुल्क लेने के बजाय सरकार आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों पर बोझ डाल रही है।
डिजिटल संप्रभुता पर चिंता
पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा यूपीआई को 'डिजिटल इंडिया' की सफलता का प्रतीक बताए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी दबाव में इसकी स्वायत्तता से समझौता करना देश की डिजिटल संप्रभुता पर सीधा आघात है। सीपीआई ने माँग की है कि यूपीआई को पूर्ण रूप से निःशुल्क बनाए रखा जाए और इस 'जनविरोधी निर्णय' को तत्काल वापस लिया जाए। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और सड़क — दोनों स्तरों पर गरमा सकता है।