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तपोवन में सीआईएसएफ का बड़ा मॉक ड्रिल: बाढ़ और बादल फटने पर 12 एजेंसियों ने साझा किया रेस्क्यू अभ्यास

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तपोवन में सीआईएसएफ का बड़ा मॉक ड्रिल: बाढ़ और बादल फटने पर 12 एजेंसियों ने साझा किया रेस्क्यू अभ्यास

सारांश

मानसून से पहले उत्तराखंड के तपोवन में सीआईएसएफ ने 12 एजेंसियों के साथ बड़ा आपदा-प्रतिक्रिया अभ्यास किया। बाढ़ और बादल फटने के परिदृश्य पर केंद्रित इस मॉक ड्रिल का लक्ष्य था — समन्वित रेस्क्यू क्षमता की जाँच और खामियों को दूर करना।

मुख्य बातें

सीआईएसएफ ने 2 जून 2025 को तपोवन, उत्तराखंड में बहु-एजेंसी मॉक ड्रिल आयोजित किया।
एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, बीआरओ, एनटीपीसी समेत 12 से अधिक एजेंसियों ने भाग लिया।
अभ्यास का केंद्र था — बादल फटने और बाढ़ की स्थिति में समन्वित रेस्क्यू ऑपरेशन।
मॉक ड्रिल को सफल घोषित किया गया; सामने आई कमियों को दूर करने की प्रक्रिया शुरू होगी।
उत्तराखंड देश के सर्वाधिक आपदा-प्रवण राज्यों में से एक है, जहाँ 2013 और 2021 में बड़ी त्रासदियाँ आ चुकी हैं।

केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने 2 जून 2025 को उत्तराखंड के तपोवन में एक बहु-एजेंसी मॉक ड्रिल का आयोजन किया, जिसमें बादल फटने और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में रेस्क्यू ऑपरेशन की तैयारियों का परीक्षण किया गया। इस अभ्यास में 12 से अधिक सरकारी और अर्धसैनिक संस्थाओं ने एकजुट होकर भाग लिया, जो उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन क्षमता को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मॉक ड्रिल में कौन-कौन शामिल हुए

इस संयुक्त अभ्यास में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ), स्टेट फायर सर्विसेज़, स्थानीय पुलिस, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ), एनटीपीसी, आईबी, एलआईए, एसडीएम कार्यालय, एचसीसी और मेडिकल टीमें शामिल रहीं। इतनी बड़ी संख्या में विभिन्न एजेंसियों की भागीदारी इस अभ्यास को व्यापक और व्यावहारिक बनाती है।

ड्रिल का उद्देश्य और रूपरेखा

अभ्यास से पहले ही एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई थी, जिसके अनुसार पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया गया। मॉक ड्रिल का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि बाढ़ या बादल फटने की स्थिति में तमाम एजेंसियाँ बिना किसी विलंब के समन्वित रेस्क्यू ऑपरेशन चला सकें। साथ ही, इस अभ्यास के ज़रिए सुरक्षाकर्मियों की मौजूदा कार्यकुशलता और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता का भी आकलन किया गया।

तालमेल की अहमियत

विशेषज्ञों और अधिकारियों के अनुसार, आपदा प्रबंधन में अक्सर तालमेल की कमी रेस्क्यू ऑपरेशन को जटिल बना देती है। यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड में मानसून पूर्व तैयारियाँ तेज़ हो रही हैं। इस मॉक ड्रिल के ज़रिए यह परखा गया कि विभिन्न एजेंसियाँ एक साझा कमांड संरचना के तहत कितनी प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं।

उत्तराखंड की आपदा-संवेदनशीलता

गौरतलब है कि उत्तराखंड देश के सर्वाधिक आपदा-प्रवण राज्यों में गिना जाता है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी से लेकर 2021 के तपोवन ग्लेशियर हादसे तक, इस राज्य ने बार-बार प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया है। ऐसे में मानसून सीज़न से पहले इस तरह का बहु-एजेंसी अभ्यास आपदा प्रतिक्रिया तंत्र को और धारदार बनाने की कोशिश है।

आगे की कार्रवाई

मॉक ड्रिल को सफल घोषित किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, अभ्यास के दौरान सामने आई किसी भी कमज़ोरी को चिह्नित कर उसे दूर करने की दिशा में तत्काल कदम उठाए जाएंगे। आने वाले मानसून सीज़न में इस तैयारी की असली परीक्षा होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि उत्तराखंड में आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं? 2021 के तपोवन ग्लेशियर हादसे में भी बहु-एजेंसी प्रतिक्रिया की कमियाँ उजागर हुई थीं। असली कसौटी यह है कि इस बार अभ्यास में उजागर खामियों को दस्तावेज़ीकृत किया जाए और मानसून से पहले उन्हें वास्तव में दूर किया जाए — न कि केवल 'सफल' की मुहर लगाकर फाइल बंद की जाए।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तपोवन में सीआईएसएफ का मॉक ड्रिल किसलिए आयोजित किया गया?
यह मॉक ड्रिल बाढ़ और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में समन्वित रेस्क्यू ऑपरेशन की तैयारी परखने के लिए आयोजित किया गया। साथ ही, इसका उद्देश्य सुरक्षाकर्मियों की मौजूदा कार्यकुशलता का आकलन करना और एजेंसियों के बीच तालमेल को मज़बूत करना भी था।
इस मॉक ड्रिल में कौन-कौन सी एजेंसियाँ शामिल थीं?
इस अभ्यास में आईटीबीपी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, स्टेट फायर सर्विसेज़, स्थानीय पुलिस, बीआरओ, एनटीपीसी, आईबी, एलआईए, एसडीएम कार्यालय, एचसीसी और मेडिकल टीमें शामिल थीं। कुल 12 से अधिक सरकारी व अर्धसैनिक संस्थाओं ने संयुक्त रूप से भाग लिया।
उत्तराखंड में इस तरह के अभ्यास क्यों ज़रूरी हैं?
उत्तराखंड देश के सर्वाधिक आपदा-प्रवण राज्यों में से एक है, जहाँ 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 के तपोवन ग्लेशियर हादसे जैसी बड़ी आपदाएँ आ चुकी हैं। मानसून सीज़न में बाढ़ और बादल फटने की घटनाएँ आम हैं, इसलिए बहु-एजेंसी समन्वय की नियमित जाँच अनिवार्य मानी जाती है।
मॉक ड्रिल के बाद आगे क्या कदम उठाए जाएंगे?
अधिकारियों के अनुसार, अभ्यास के दौरान उजागर हुई किसी भी कमज़ोरी को चिह्नित कर उसे दूर करने की दिशा में काम शुरू किया जाएगा। मॉक ड्रिल को सफल घोषित किया गया है और इससे मिली सीख को भविष्य की आपदा प्रतिक्रिया योजनाओं में शामिल किया जाएगा।
सीआईएसएफ की आपदा प्रबंधन में क्या भूमिका है?
सीआईएसएफ मुख्यतः औद्योगिक और संवेदनशील प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए जानी जाती है, लेकिन आपदा-प्रवण क्षेत्रों में तैनात इकाइयाँ स्थानीय प्रशासन और अन्य बलों के साथ मिलकर रेस्क्यू और राहत कार्यों में भी सहयोग करती हैं। तपोवन जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इनकी भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
राष्ट्र प्रेस
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