एआईएमपीएलबी का विरोध: 'वंदे मातरम' के सभी छह श्लोक अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला

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एआईएमपीएलबी का विरोध: 'वंदे मातरम' के सभी छह श्लोक अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला

सारांश

केंद्र सरकार ने 'वंदे मातरम' के सभी छह श्लोकों को सरकारी व शैक्षणिक संस्थानों में अनिवार्य कर दिया है — और एआईएमपीएलबी ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताते हुए न्यायालय तक लड़ाई ले जाने की चेतावनी दी है। 1937 की कांग्रेस सर्वसम्मति और 1950 की संविधान सभा के निर्णय को दरकिनार करना इस विवाद को संवैधानिक बनाता है।

मुख्य बातें

एआईएमपीएलबी ने 7 मई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के उस निर्णय का कड़ा विरोध किया जिसमें ' वंदे मातरम ' के सभी छह श्लोकों को सरकारी व शैक्षणिक संस्थानों में अनिवार्य किया गया है।
बोर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ.
एसक्यूआर इलियास ने इसे असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और इस्लाम के तौहीद सिद्धांत के विरुद्ध बताया।
1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने केवल पहले दो श्लोकों के प्रयोग का निर्णय लिया था; संविधान सभा ने 1950 में भी इसी सर्वसम्मति को बरकरार रखा था।
बोर्ड ने सरकार को चेतावनी दी कि निर्णय वापस न होने पर न्यायालय में संवैधानिक चुनौती दी जाएगी।
बोर्ड के अनुसार राष्ट्रीय एकता बल प्रयोग से नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के सम्मान से मजबूत होती है।

अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने 7 मई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के उस निर्णय के विरुद्ध कड़ा विरोध दर्ज कराया है, जिसमें 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान दर्जा देते हुए इसके सभी छह श्लोकों का पाठ समस्त सरकारी एवं शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान से पूर्व अनिवार्य किया गया है। बोर्ड ने इस कदम को भारत के संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का प्रत्यक्ष उल्लंघन करार देते हुए सरकार से इसे तत्काल वापस लेने की माँग की है।

बोर्ड की मुख्य आपत्तियाँ

एआईएमपीएलबी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि मंत्रिमंडल का यह निर्णय न केवल असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है, बल्कि देश की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता के भी सर्वथा विरुद्ध है। उनके अनुसार, एक धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी एक समुदाय की धार्मिक अवधारणाओं को बलपूर्वक समस्त नागरिकों पर थोप नहीं सकता।

डॉ. इलियास ने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम के कई श्लोकों में देवी दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की स्तुति है, जो इस्लाम के तौहीद (ईश्वर की पूर्ण एकता) के सिद्धांत के प्रत्यक्ष विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में शिर्क (ईश्वर के साथ साझीदार ठहराना) के किसी भी रूप की अनुमति नहीं है, अतः मुस्लिम नागरिकों को ऐसे पाठ के लिए बाध्य करना उनकी धार्मिक आस्था पर सीधा आघात है।

ऐतिहासिक सर्वसम्मति से विचलन

डॉ. इलियास ने याद दिलाया कि 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने स्वयं निर्णय लिया था कि 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो श्लोकों का ही प्रयोग किया जाए, क्योंकि बाद के श्लोक धार्मिक प्रकृति के थे और समाज के सभी वर्गों को स्वीकार्य नहीं थे। इसी ऐतिहासिक वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए संविधान सभा ने 1950 में भी केवल पहले दो श्लोकों को ही राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति दी थी।

गौरतलब है कि यह ऐतिहासिक सर्वसम्मति दशकों की सांप्रदायिक सद्भावना और राष्ट्रीय एकता की बुनियाद पर टिकी थी। बोर्ड के अनुसार, अब सभी छह श्लोकों को अनिवार्य बनाना इस सर्वसम्मति से न केवल विचलन है, बल्कि एक उकसाने वाला और खतरनाक कदम भी है।

राष्ट्रीय एकता पर बोर्ड का पक्ष

बोर्ड ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि देश की एकता और अखंडता को बल प्रयोग, जबरन एकरूपता या धार्मिक बहुसंख्यकवाद के माध्यम से नहीं, बल्कि संविधान के पालन, आपसी सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के माध्यम से ही मजबूत किया जा सकता है। बोर्ड ने सरकार से आग्रह किया कि वह संवेदनशील धार्मिक मुद्दों का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दुरुपयोग न करे।

अदालत में चुनौती की चेतावनी

एआईएमपीएलबी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सरकार इस निर्णय को तत्काल वापस नहीं लेती, तो बोर्ड इसे न्यायालय में चुनौती देने के लिए विवश होगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ है। आने वाले दिनों में इस विवाद के न्यायिक और संसदीय दोनों मोर्चों पर तीखा होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और इस निर्णय की न्यायिक परीक्षा अवश्यंभावी लगती है। यह विवाद केवल एक गीत तक सीमित नहीं — यह उस बड़े प्रश्न की परीक्षा है कि भारत की बहुलतावादी पहचान संवैधानिक ढाँचे में कितनी सुरक्षित है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केंद्र सरकार ने 'वंदे मातरम' को लेकर क्या नया निर्णय लिया है?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान दर्जा देते हुए इसके सभी छह श्लोकों का पाठ समस्त सरकारी एवं शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान से पूर्व अनिवार्य किया है। यह निर्णय पहले की उस व्यवस्था से अलग है जिसमें केवल पहले दो श्लोक ही प्रचलन में थे।
एआईएमपीएलबी को 'वंदे मातरम' के सभी छह श्लोकों पर आपत्ति क्यों है?
बोर्ड के अनुसार वंदे मातरम के कई श्लोकों में देवी दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की स्तुति है, जो इस्लाम के तौहीद सिद्धांत के विरुद्ध है। मुस्लिम नागरिकों को ऐसे पाठ के लिए बाध्य करना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
1937 और 1950 में 'वंदे मातरम' को लेकर क्या निर्णय हुए थे?
1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने केवल पहले दो श्लोकों के प्रयोग का निर्णय लिया था क्योंकि बाद के श्लोक धार्मिक प्रकृति के थे। 1950 में संविधान सभा ने भी इसी सर्वसम्मति को बरकरार रखा था।
एआईएमपीएलबी ने सरकार के सामने क्या माँग रखी है?
बोर्ड ने सरकार से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की माँग की है। साथ ही चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो बोर्ड इस निर्णय को न्यायालय में संवैधानिक चुनौती देगा।
इस विवाद का आम नागरिकों और छात्रों पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि यह निर्णय लागू रहा तो सभी सरकारी कर्मचारियों और सरकारी व शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों को राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम के सभी छह श्लोकों का पाठ करना अनिवार्य होगा। धार्मिक आपत्ति रखने वाले नागरिकों के लिए यह संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न बन सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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