स्वतंत्रता दिवस 2026: लाल किले की प्राचीर से पहली बार गूंजेगा 'वंदे मातरम', नेताओं ने बताया ऐतिहासिक क्षण
सारांश
मुख्य बातें
इस वर्ष 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से पहली बार राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' की धुन गूंजेगी — एक ऐसा निर्णय जिसे सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति दीर्घ-प्रतीक्षित सम्मान बताया है। नई दिल्ली में 12 अगस्त 2026 को इस घोषणा के सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया।
मुख्य घोषणा और उसका महत्व
स्वतंत्रता दिवस समारोह के इतिहास में यह पहला अवसर होगा जब लाल किले से आधिकारिक रूप से 'वंदे मातरम' बजाया जाएगा। गौरतलब है कि यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित है और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा था। इसे भारत का राष्ट्रगीत घोषित किया गया है, जबकि 'जन गण मन' राष्ट्रगान है।
नेताओं की प्रतिक्रिया
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा, 'देश को उस अमर गीत को सुनने के लिए इतने साल इंतजार करना पड़ा, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों लोगों को बलिदान और देश के लिए समर्पण की प्रेरणा दी। मेरा मानना है कि उन सभी लोगों की आत्माएं और दिल निश्चित रूप से शांति और खुशी महसूस करेंगे जब राष्ट्र का वह अमर गीत लाल किले की प्राचीर से गूंजेगा।'
केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने इस अवसर को प्रधानमंत्री के जन-संकल्प से जोड़ते हुए कहा, 'वंदे मातरम। प्रधानमंत्री ने देश की जनता से संकल्प लिया था कि हम सब मिलकर हर घर में तिरंगा फहराएंगे। यह एक बहुत बड़ा संदेश है।'
भाजपा सांसदों का नज़रिया
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद मनोज तिवारी ने कहा, 'वंदे मातरम बहुत पहले से गूंजना चाहिए था। बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे एक विशेष भावना के साथ लिखा था, और स्वतंत्र भारत ने उसे उसी भावना से स्वीकार किया। कुछ लोगों ने वंदे मातरम् को बांटने की कोशिश की, लेकिन जब देश की जनता ने पीएम मोदी को नेतृत्व सौंपा, तो वह बांटने वाली भावना खत्म हो गई। वंदे मातरम को एक बार फिर पूरे रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है, और इस साल इसे लाल किले पर भी बजाया जाएगा।'
BJP सांसद राधा मोहन सिंह ने कहा, 'भारत के स्वतंत्रता संग्राम में 'वंदे मातरम' के नारे ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। कई सालों तक इसकी उपेक्षा होना दुर्भाग्यपूर्ण था। आज हम सौभाग्यशाली हैं कि पीएम मोदी के नेतृत्व में 'वंदे मातरम' की गूंज एक बार फिर लाल किले से सुनाई देगी और पूरी दुनिया में सुनी जाएगी।'
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब सरकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़े प्रतीकों को पुनर्स्थापित करने की दिशा में कई कदम उठा रही है। 'वंदे मातरम' का उद्गम बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) से है और यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन का प्रतीक रहा है। स्वतंत्रता के बाद इसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला, परंतु आधिकारिक समारोहों में इसकी उपस्थिति सीमित रही।
आगे का परिदृश्य
नेताओं का मानना है कि 15 अगस्त को लाल किले से 'वंदे मातरम' का गूंजना देशभर में देशभक्ति की भावना को और प्रगाढ़ करेगा तथा आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देगा। यह निर्णय स्वतंत्रता दिवस समारोह के स्वरूप में एक उल्लेखनीय बदलाव के रूप में दर्ज होगा।