वाराणसी में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की नई पहल, चतुरंगिनी सेना बनेगी गोरक्षा की ताकत
सारांश
Key Takeaways
- चतुरंगिनी सेना का गठन गोरक्षा के उद्देश्य से किया गया है।
- यह संगठन समाज में न्याय और सुरक्षा की भावना को बढ़ावा देगा।
- “टोको, रोको और ठोको” सिद्धांत के माध्यम से कार्यप्रणाली को स्पष्ट किया गया है।
- फरसा अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा का प्रतीक है।
- धार्मिक स्थलों पर अनुयायियों को प्रवेश की अनुमति होती है।
वाराणसी, 23 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वाराणसी में 27 सदस्यों की चतुरंगिनी सेना के गठन की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य आगे चलकर गोरक्षा को सशक्त करना है। मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि यह कदम हिंदू समाज में व्याप्त भय को समाप्त करने और सत्य के प्रति खड़े होने की हिम्मत पैदा करने के लिए उठाया गया है।
उन्होंने कहा कि यह संगठन अगले 10 महीनों में विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य करेगा और लोगों के बीच विश्वास और सुरक्षा की भावना को बढ़ावा देगा।
शंकराचार्य ने बताया कि वर्तमान समय में कई लोग भय के कारण सच का साथ नहीं दे पाते और मजबूरी में गलत का समर्थन कर देते हैं। चतुरंगिनी सेना का मूल उद्देश्य निर्बलों का बल बनना और समाज में न्याय स्थापित करना होगा।
उन्होंने इस संगठन के कार्यप्रणाली को “टोको, रोको और ठोको” के सिद्धांत के माध्यम से समझाया। पहले चरण में गलत कार्यों की पहचान कर लोगों को समझाया जाएगा। यदि सुधार नहीं होता है, तो उसका विरोध कर उसे रोकने की कोशिश की जाएगी। अंतिम चरण में “ठोको” का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार शिकायत दर्ज कराने, पंचायत करने और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उपयोग करने से है।
फरसा धारण करने के सवाल पर, उन्होंने भगवान परशुराम का उदाहरण देते हुए कहा कि परशुराम ने पहले वेदों का अध्ययन किया और तपस्या में जीवन बिताया। उनके आश्रम में गौ माता की सेवा होती थी, लेकिन जब राजा सहस्रार्जुन ने गायों पर आक्रमण किया, तो उन्होंने उनकी रक्षा के लिए शस्त्र धारण किया। शंकराचार्य ने कहा कि फरसा उसी परंपरा का प्रतीक है, जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है।
एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा के अनुसार, किसी भी धार्मिक स्थल पर उसी धर्म के अनुयायियों को प्रवेश दिया जाता है। उन्होंने इसे सदियों पुरानी व्यवस्था बताते हुए कहा कि इसका पालन समाज में धार्मिक अनुशासन और मर्यादा बनाए रखने के लिए आवश्यक है।