वाराणसी विश्व संगोष्ठी दूसरा दिन: प्राचीन दर्शन से एआई और ग्रीन एनर्जी तक, वैश्विक विद्वानों का मंथन
सारांश
मुख्य बातें
वाराणसी में 3 नवंबर 2026 को विश्व संगोष्ठी 'प्राचीन ज्ञान से आधुनिक चुनौतियां' के दूसरे दिन दुनियाभर के विद्वानों ने प्राचीन दर्शन को आज की जटिल समस्याओं — राजनीति, सामाजिक सद्भाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और ग्रीन एनर्जी — से जोड़ने पर गहन विचार-विमर्श किया। संगोष्ठी में हांगकांग, लंदन, ग्रीस और जापान से आए शीर्ष विशेषज्ञों ने यह विचार साझा किया कि सहस्राब्दी पुराना ज्ञान आज भी समाज और शासन को दिशा दे सकता है।
मुख्य घटनाक्रम
हांगकांग विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर जस्टिन टिवाल्ड ने सम्मेलन में प्रस्तुतकर्ता और प्रतिभागी दोनों की भूमिका निभाते हुए कहा, 'चर्चाएं विशेष रूप से राजनीति और सामाजिक सद्भाव पर केंद्रित हैं। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ग्रीन एनर्जी जैसे समकालीन मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है।' उन्होंने शासन के प्रश्न को सम्मेलन की केंद्रीय धुरी बताया और कहा कि खराब शासन — चाहे वह स्वास्थ्य सेवा हो, संसाधनों का निष्पक्ष वितरण हो या अन्य आवश्यक क्षेत्र — को समझने के लिए प्राचीन दर्शन की दृष्टि अपरिहार्य है।
पश्चिमी ज्ञान से परे देखने की प्रेरणा
लंदन के एसओएएस (SOAS) यूनिवर्सिटी की सीनियर लेक्चरर मंजीत रामगोत्रा ने कहा कि यह सम्मेलन दुनियाभर से प्राचीन दर्शन पर चर्चाओं को एक व्यापक मंच पर लाता है और आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत, संस्थाओं तथा लोकतंत्र पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करता है। उन्होंने जोर देकर कहा, 'यह हमें पश्चिमी ज्ञान और मूल्यों से परे देखने और समाज की हमारी समझ को आकार देने में मदद के लिए ज्ञान के अन्य स्रोतों का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है।' गौरतलब है कि रामगोत्रा ने स्वीकार किया कि भारत की यह उनकी पहली यात्रा थी और उन्होंने कहा कि यह यात्रा बहुत पहले हो जानी चाहिए थी।
एआई पर विशेषज्ञ की राय
ग्रीस के नेशनल एंड कापोडिस्ट्रियन यूनिवर्सिटी ऑफ एथेंस में सूचना और दूरसंचार के प्रोफेसर यानिस इओनिडिस ने एआई को लेकर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, 'फैसला हमारे हाथ में है। एआई किसी भी अन्य तकनीक की तरह है — एक बहुत अधिक शक्तिशाली तकनीक जो हमारे दिमाग को प्रभावित करती है, लेकिन इसका इस्तेमाल हम पर निर्भर करता है।' यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण वक्तव्य है जब एआई के नैतिक उपयोग पर वैश्विक बहस तेज़ हो रही है।
प्राचीन संस्कृतियों की समकालीन प्रासंगिकता
जापानी साहित्य के विद्वान पीटर मैकमिलन ने इस सम्मेलन को अपने शोध-जीवन की स्वाभाविक परिणति बताया। उन्होंने कहा, 'मेरे जीवन का कार्य प्राचीन संस्कृतियों पर शोध और इस बात पर केंद्रित रहा है कि वे आज के समाज में और भविष्य में अच्छा जीवन जीने में हमारा मार्गदर्शन कैसे कर सकती हैं।' उनकी यह टिप्पणी संगोष्ठी की मूल भावना — अतीत के ज्ञान को भविष्य की राह में उपकरण बनाना — को रेखांकित करती है।
आगे की दिशा
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर शासन-संकट, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी त्वरण के बीच मानवता के सामने बहुआयामी चुनौतियाँ खड़ी हैं। वाराणसी जैसे प्राचीन नगर में आयोजित इस संगोष्ठी का प्रतीकात्मक महत्व भी कम नहीं — जहाँ सदियों से ज्ञान-परंपरा की धारा बहती रही है। विद्वानों की आम सहमति यही रही कि प्राचीन दर्शन को आधुनिक नीति-निर्माण में एकीकृत करना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।