वाराणसी विश्व संगोष्ठी: प्राचीन ज्ञान से आधुनिक चुनौतियों के समाधान पर विशेषज्ञों की सहमति
सारांश
मुख्य बातें
वाराणसी में 2 नवंबर 2026 को आयोजित 'आधुनिक चुनौतियों के लिए प्राचीन ज्ञान' विषयक तीन दिवसीय विश्व संगोष्ठी में दुनिया भर के शिक्षाविदों, दार्शनिकों और विशेषज्ञों ने एकमत से यह विचार व्यक्त किया कि सदियों पुरानी परंपराएँ और ज्ञान-परंपराएँ आज की जटिल वैश्विक चुनौतियों से निपटने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। विशेषज्ञों ने युवा पीढ़ी के साथ इन विचारों को साझा करने और संवाद की संस्कृति को मज़बूत करने की भी आवश्यकता पर बल दिया।
संगोष्ठी का संदर्भ और महत्व
यह विश्व संगोष्ठी अपने तीसरे संस्करण में भारत में पहली बार आयोजित की जा रही है। इससे पहले इस श्रृंखला के दो आयोजन क्रमशः ग्रीस और चीन में हो चुके हैं। वाराणसी को आयोजन स्थल के रूप में विशेष रूप से इसलिए चुना गया क्योंकि यह नगरी हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म — तीनों से गहरे रूप से जुड़ी है।
कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री और प्रोफेसर निरुपम बाजपेयी ने कहा, 'मेरा मानना है कि भारत में इस आयोजन की मेजबानी के लिए वाराणसी से अधिक उपयुक्त कोई दूसरी जगह नहीं हो सकती। हमने शुरुआत से ही वाराणसी पर विचार किया था और इसी के अनुरूप संगोष्ठी का केंद्र इन तीनों धर्मों को बनाया गया है।'
उद्घाटन सत्र: डॉ. प्रीति अदाणी का मुख्य संबोधन
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में अदाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अदाणी ने 'आधुनिक चुनौतियों के लिए प्राचीन ज्ञान की प्रासंगिकता' विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा, 'प्राचीन ज्ञान केवल इसलिए मूल्यवान नहीं हो जाता क्योंकि वह प्राचीन है। वह तब मूल्यवान बनता है, जब हम समकालीन समस्याओं के लिए उसकी प्रासंगिकता को समझते हैं।'
डॉ. अदाणी ने सभ्यतागत ज्ञान को संरक्षित करने और इसे पीड़ा, असमानता तथा संघर्ष जैसी वर्तमान समस्याओं से निपटने के लिए उपयोग में लाने का आह्वान किया। उनके इस दृष्टिकोण को कार्यक्रम में शामिल अनेक वैश्विक विद्वानों का समर्थन मिला।
वैश्विक विशेषज्ञों के विचार
नीदरलैंड स्थित यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर चियारा रोबियानो ने संवाद की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, 'हमें एक-दूसरे के साथ समय बिताने और यह समझने में सक्षम होना चाहिए कि किसी भी समय हमारा व्यक्तित्व हमारे बीच होने वाली घटनाओं से आकार लेता है। संवाद के माध्यम से हम नए व्यक्तित्व के रूप में उभरते हैं।'
प्रिटोरिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जहरा मैकडोनाल्ड ने इन परंपराओं को आधुनिक शिक्षा में समाहित करने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, 'यह इन संस्कृतियों को आधुनिक शिक्षा में शामिल करने के बारे में है। हम गणित और पढ़ने-पढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते रहे हैं और यह महत्वपूर्ण भी है, लेकिन हम इन विषयों की उपेक्षा नहीं कर सकते।'
अमेरिकी दार्शनिक थैडियस मेट्ज ने तर्क दिया कि पुरानी परंपराएँ इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि उनमें गहरा ज्ञान संचित है। उनके अनुसार, 'यदि विचारों की कोई परंपरा कई सदियों तक प्रासंगिक बनी रही है, तो निश्चित रूप से उसमें मानवीय स्थिति और चीजों को बेहतर बनाने के तरीकों से जुड़े मूल्यवान विचार मौजूद हैं।'
संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क (SDSN) के अध्यक्ष जेफरी सैश ने भारत की आर्थिक वृद्धि और अदाणी समूह की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा, 'जब हम भारत की बहुत तेज़ आर्थिक वृद्धि को देखते हैं, जो दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो इसमें बुनियादी ढाँचे के विकास की महत्वपूर्ण भूमिका है।'
सामुदायिक संवाद और परिवार की भूमिका
चिन्मय इंटरनेशनल फाउंडेशन (CIF) की अकादमिक निदेशक गौरी महुलीकर ने संयुक्त परिवार की परंपरा को संघर्ष-निवारण के एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, 'यदि हम एक-दूसरे के प्रति भी यही भावना विकसित करें, तो संघर्ष का कोई सवाल ही नहीं उठेगा।' गौरतलब है कि यह विचार वैश्विक सामाजिक विखंडन के दौर में विशेष प्रासंगिकता रखता है।
आगे की राह
यह तीन दिवसीय संगोष्ठी वाराणसी में जारी है और इसमें दुनिया भर से आए विद्वान विभिन्न सत्रों में प्राचीन ज्ञान परंपराओं के समकालीन अनुप्रयोगों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संगोष्ठी से निकले निष्कर्ष वैश्विक नीति-निर्माण और शिक्षा प्रणाली को एक नई दिशा देने में सहायक हो सकते हैं।