INS उदयगिरि और INS कवरत्ती वियतनाम पहुंचे, भारत-वियतनाम नौसैनिक साझेदारी को नई ऊंचाई
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय नौसेना के दो स्वदेशी युद्धपोत — आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस कवरत्ती — 22 जून 2026 को वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी स्थित न्हा रोंग बंदरगाह पहुंचे। यह तैनाती पूर्वी बेड़े के अंतर्गत एक ऑपरेशनल मिशन का हिस्सा है और मई 2026 में दोनों देशों के बीच स्थापित उन्नत व्यापक सामरिक साझेदारी के बाद वियतनाम में भारतीय नौसेना की पहली बड़ी उपस्थिति है।
नौसैनिक दल और युद्धपोतों का परिचय
इस नौसैनिक दल का नेतृत्व पूर्वी बेड़े के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग रियर एडमिरल आलोक आनंद कर रहे हैं। आईएनएस उदयगिरि एक अत्याधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट है, जबकि आईएनएस कवरत्ती पनडुब्बी रोधी युद्धक क्षमता से लैस एक उन्नत कोर्वेट है। दोनों युद्धपोत स्वदेशी रूप से डिजाइन एवं निर्मित हैं और भारत की आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
बंदरगाह प्रवास के दौरान गतिविधियाँ
हो ची मिन्ह सिटी में प्रवास के दौरान भारतीय नौसेना और वियतनाम पीपुल्स नेवी के बीच अनेक पेशेवर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें सैन्य विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श, क्रॉस-डेक विजिट, संयुक्त खेल प्रतियोगिताएं और सामुदायिक संपर्क कार्यक्रम शामिल हैं। इसके अतिरिक्त दोनों देशों के वरिष्ठ नौसैनिक अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बैठकें भी होंगी, जिनमें क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा, आपसी सहयोग और साझा हितों पर चर्चा की जाएगी।
द्विपक्षीय संबंधों का रणनीतिक संदर्भ
गौरतलब है कि मई 2026 में भारत और वियतनाम ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को उन्नत व्यापक सामरिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया था। यह नौसैनिक यात्रा उसी कूटनीतिक उन्नयन की व्यावहारिक परिणति है। यह ऐसे समय में आई है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को लेकर क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।
स्वागत और क्षेत्रीय महत्व
हो ची मिन्ह सिटी पहुंचने पर भारतीय युद्धपोतों का वियतनाम पीपुल्स नेवी, हो ची मिन्ह सिटी पीपुल्स कमेटी और बंदरगाह प्राधिकरणों ने औपचारिक एवं गर्मजोशी से स्वागत किया। यह स्वागत दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच दशकों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों और निरंतर प्रगाढ़ होती समुद्री साझेदारी को रेखांकित करता है।
आगे की राह
भारतीय नौसेना की यह तैनाती मित्र देशों के साथ समुद्री सहयोग को गहरा करने की व्यापक रणनीति का अंग है। विशेषज्ञों के अनुसार यह यात्रा हिंद-प्रशांत में मुक्त नौवहन, क्षेत्रीय स्थिरता और साझा सुरक्षा हितों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ करेगी।