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तमिलनाडु विधानसभा में CM विजय आज पेश करेंगे परिसीमन-विरोधी प्रस्ताव, 543 सीटें बनाए रखने की माँग

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तमिलनाडु विधानसभा में CM विजय आज पेश करेंगे परिसीमन-विरोधी प्रस्ताव, 543 सीटें बनाए रखने की माँग

सारांश

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय आज विधानसभा में परिसीमन-विरोधी प्रस्ताव पेश करेंगे — यह सिर्फ एक राज्य का विरोध नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की उस सामूहिक आवाज़ का प्रतिनिधित्व है जो जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद संसदीय प्रतिनिधित्व खोने की आशंका से चिंतित है।

मुख्य बातें

जोसेफ विजय 12 अगस्त 2026 को तमिलनाडु विधानसभा में परिसीमन-विरोधी विशेष प्रस्ताव पेश करेंगे।
प्रस्ताव में केंद्र से लोकसभा सीटों की संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने और मौजूदा आवंटन फ्रीज़ करने की माँग।
8 अगस्त को चेन्नई में हुई सांसदों की परामर्श बैठक के बाद यह प्रस्ताव तैयार किया गया।
प्रस्ताव में 1971 की जनगणना आधारित सीट-वितरण को बदलने का विरोध; 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को नुकसान की आशंका।
मौजूदा 543 निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर 2029 लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण लागू करने की भी माँग।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय बुधवार, 12 अगस्त 2026 को तमिलनाडु विधानसभा में एक विशेष सरकारी प्रस्ताव पेश करेंगे, जिसमें किसी भी ऐसी परिसीमन प्रक्रिया का विरोध किया जाएगा जो संसद में राज्य के सापेक्ष प्रतिनिधित्व को कम कर सकती है। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से लोकसभा की सीटों की संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने और राज्यों के बीच सीटों के मौजूदा आवंटन को फ्रीज़ करने का आग्रह किया जाएगा।

प्रस्ताव की पृष्ठभूमि

यह विशेष प्रस्ताव मुख्यमंत्री विजय की अध्यक्षता में 8 अगस्त 2026 को चेन्नई में आयोजित सांसदों की एक परामर्श बैठक के कुछ दिनों बाद आया है। उस बैठक में तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों पर परिसीमन के संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई थी। बैठक में एकमत से यह तय किया गया कि लोकसभा की सीटों की संख्या 543 पर स्थिर रखी जाए और राज्यों के बीच संसदीय सीटों के मौजूदा अनुपात को संरक्षित किया जाए।

प्रस्ताव में क्या है

विधानसभा के एजेंडा के अनुसार, प्रस्तावित प्रस्ताव में रेखांकित किया गया है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच लोकसभा और विधानसभा सीटों का आवंटन कई दशकों से 1971 की जनगणना से जुड़ा हुआ है। प्रस्ताव में अप्रैल 2026 में संसद में पारित न हो सके उस संवैधानिक संशोधन विधेयक का उल्लेख है, जिसमें परिसीमन पर लंबे समय से चली आ रही रोक हटाने, 2011 की जनगणना के आधार पर नए सिरे से परिसीमन करने और लोकसभा की सीटों में पर्याप्त वृद्धि का प्रस्ताव था।

प्रस्ताव में उन खबरों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है कि इसी तरह का संवैधानिक संशोधन दोबारा पेश किया जा सकता है। इसमें तर्क दिया गया है कि 1971 के बाद दर्ज जनसंख्या आँकड़ों के आधार पर सीटों का कोई भी पुनर्वितरण तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा — वे राज्य जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।

दक्षिणी राज्यों की दलील

प्रस्ताव में यह केंद्रीय तर्क रखा गया है कि जिन राज्यों ने केंद्र सरकार द्वारा प्रोत्साहित जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू किया, आर्थिक विकास दर्ज किया और स्वास्थ्य सेवा एवं कल्याण संकेतकों में सुधार किया — उन्हें परिसीमन के ज़रिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि यह तर्क दक्षिण भारतीय राज्यों की उस व्यापक चिंता को रेखांकित करता है, जिसे वे 'जनसांख्यिकीय दंड' कहते हैं।

महिला आरक्षण और बजट पर भी चर्चा

प्रस्ताव में यह माँग भी शामिल है कि मौजूदा 543 निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए। साथ ही, यह आरक्षण आगामी राज्य विधानसभा चुनावों में भी लागू करने का आग्रह किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, सदन 2026-27 के संशोधित बजट और संशोधित कृषि बजट पर आम चर्चा के संबंध में सरकार की प्रतिक्रिया पर भी विचार करेगा।

आगे क्या होगा

यह प्रस्ताव पारित होने के बाद केंद्र सरकार को भेजा जाएगा, हालाँकि संवैधानिक रूप से यह केंद्र पर बाध्यकारी नहीं होगा। फिर भी, यह दक्षिणी राज्यों की एकजुट राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतीक बनेगा और परिसीमन पर राष्ट्रीय बहस को और तेज़ करने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वे अब परिसीमन के ज़रिए संसदीय शक्ति खोने की कगार पर हो सकते हैं — यह विरोधाभास किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए असहज करने वाला है। अप्रैल 2026 में संवैधानिक संशोधन विधेयक का संसद में पारित न हो पाना यह बताता है कि यह मुद्दा केवल दक्षिण की चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सहमति की परीक्षा है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करती है कि 543 सीटें फ्रीज़ करने की माँग दरअसल महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने की शर्त से भी जुड़ी है — जो इस प्रस्ताव को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि लैंगिक न्याय का भी मुद्दा बनाती है।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु विधानसभा में परिसीमन-विरोधी प्रस्ताव क्या है?
यह 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश किया जाने वाला विशेष सरकारी प्रस्ताव है, जिसमें केंद्र से लोकसभा की सीटें 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने और राज्यों के बीच सीटों के मौजूदा आवंटन को फ्रीज़ करने की माँग की जाएगी। यह किसी भी ऐसी परिसीमन प्रक्रिया का विरोध करता है जो दक्षिणी राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व घटा सकती है।
तमिलनाडु परिसीमन का विरोध क्यों कर रहा है?
तमिलनाडु का तर्क है कि 1971 के बाद की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उन राज्यों को दंडित करेगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है। राज्य का कहना है कि बेहतर स्वास्थ्य, कल्याण और आर्थिक संकेतकों के बावजूद संसदीय हिस्सेदारी घटाना अनुचित है।
इस प्रस्ताव में महिला आरक्षण का क्या प्रावधान है?
प्रस्ताव में माँग की गई है कि मौजूदा 543 निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। साथ ही, यह आरक्षण आगामी राज्य विधानसभा चुनावों में भी लागू करने का आग्रह किया जाएगा।
अप्रैल 2026 का संवैधानिक संशोधन विधेयक क्या था?
अप्रैल 2026 में संसद में एक संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया गया था, जिसमें परिसीमन पर दशकों से चली आ रही रोक हटाने, 2011 की जनगणना के आधार पर नए सिरे से परिसीमन करने और लोकसभा सीटों में वृद्धि का प्रस्ताव था। यह विधेयक संसद में पारित नहीं हो सका था।
इस प्रस्ताव से पहले क्या हुआ था?
8 अगस्त 2026 को चेन्नई में मुख्यमंत्री विजय की अध्यक्षता में सांसदों की एक परामर्श बैठक हुई थी, जिसमें तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों पर परिसीमन के संभावित प्रभावों पर चर्चा की गई। उसी बैठक में यह तय किया गया कि लोकसभा सीटें 543 पर स्थिर रखने की माँग को विधानसभा प्रस्ताव के ज़रिए आगे बढ़ाया जाए।
राष्ट्र प्रेस
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