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विजयादशमी 2026: मिठाइयाँ दोगुनी महंगी, फिर भी बंगाल का उत्साह बरकरार

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विजयादशमी 2026: मिठाइयाँ दोगुनी महंगी, फिर भी बंगाल का उत्साह बरकरार

सारांश

दूध और चीनी की बढ़ती कीमतों ने इस विजयादशमी पर कोलकाता में मिठाइयों के दाम लगभग दोगुने कर दिए — ₹10-15 से सीधे ₹20-30 प्रति पीस। लेकिन बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा पर महंगाई का कोई असर नहीं पड़ा; परिवार बजट से आगे जाकर भी रस्म निभाते रहे।

मुख्य बातें

विजयादशमी 2026 पर कोलकाता में मिठाइयों की कीमतें ₹10-15 से बढ़कर ₹20-30 प्रति पीस हो गईं — लगभग दोगुनी।
दूध और चीनी की बढ़ती थोक कीमतों के साथ-साथ कारीगरों की बढ़ी दिहाड़ी ने भी मूल्यवृद्धि में योगदान दिया।
दुर्गा पूजा से पहले ₹2-5 प्रति पीस की प्रारंभिक बढ़ोतरी हुई; विजयादशमी पर माँग के चरम पर दाम और बढ़ाए गए।
गृहिणी डोलन सेनगुप्ता समेत कई परिवारों ने महंगाई के बावजूद उत्सव की तैयारियों में कोई कटौती नहीं की।
व्यापारियों ने कहा कि यदि कच्चे माल के दाम नहीं घटे तो दीपावली पर भी कीमतें ऊँची रह सकती हैं।

कोलकाता में 21 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के अवसर पर रसगुल्ला और संदेश जैसी लोकप्रिय मिठाइयों की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं — फिर भी बंगाली परिवारों में मिठाई आदान-प्रदान की सदियों पुरानी परंपरा पर इस महंगाई का कोई खास असर नहीं पड़ा। दूध और चीनी के दामों में भारी उछाल के कारण जो मिठाइयाँ पिछले वर्ष ₹10 से ₹15 प्रति पीस में मिलती थीं, वे इस बार ₹20 से ₹30 प्रति पीस तक बिक रही हैं।

मुख्य घटनाक्रम

चार दिनों तक चलने वाले दुर्गा पूजा उत्सव का समापन विजयादशमी पर देवी दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ होता है। इस अवसर पर रिश्तेदारों, मित्रों और प्रियजनों के बीच मिठाइयाँ बाँटना दशकों से बंगाली संस्कृति की आत्मा रही है। 'मां दुर्गा' को 'बेटी दुर्गा' के रूप में विदा करने की भावनात्मक रस्म में मिठाइयाँ केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।

इस बार दुर्गा पूजा से पहले ही कीमतों में ₹2 से ₹5 प्रति पीस की बढ़ोतरी कर दी गई थी। विजयादशमी के दिन — बुधवार को — माँग में होने वाली पारंपरिक तेजी का फायदा उठाते हुए दुकानदारों ने दाम और ऊँचे कर दिए।

दुकानदारों की दलील

दक्षिण कोलकाता की एक प्रसिद्ध मिठाई की दुकान के मालिक बिवु दास ने बताया कि त्योहारी माँग और दूध-चीनी के बढ़े हुए दाम दोनों ने मिलकर उन्हें कीमतें बढ़ाने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा, 'दुर्गा पूजा से ठीक पहले दूध और चीनी के दाम बहुत ज़्यादा बढ़ जाने की वजह से हमें रसगुल्ला और संदेश जैसी मिठाइयों के दाम बढ़ाने पड़े।'

उत्तरी कोलकाता में मिठाई की दुकान चलाने वाले शशि घोष ने एक और पहलू सामने रखा। उनके अनुसार बढ़ती महंगाई को देखते हुए दुर्गा पूजा से पहले मिठाई बनाने वाले कारीगरों की दिहाड़ी भी बढ़ानी पड़ी, जिसका सीधा असर अंतिम कीमत पर पड़ा। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में खाद्य महंगाई का दबाव मध्यम वर्गीय परिवारों पर लगातार बना हुआ है।

आम जनता पर असर

कीमतों में भारी उछाल के बावजूद मध्यम वर्गीय बंगाली परिवारों ने इस पर्व की तैयारियों में कोई कटौती नहीं की। डोलन सेनगुप्ता, एक गृहिणी, ने बताया: 'विजयादशमी एक ऐसा अवसर है जब रिश्तेदार, दोस्त और अपने करीबी लोग एक साथ आते हैं। इस दौरान वे साल भर चले आ रहे मतभेदों और गलतफहमियों को भुला देते हैं।' उन्होंने कहा कि इस साल बढ़ती कीमतों के बावजूद उन्होंने अपने उत्सव के बजट से ज़्यादा खर्च किया, लेकिन तैयारियों में कोई समझौता नहीं किया।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब त्योहारी सीज़न में कच्चे माल की महंगाई ने मिठाइयों के दाम प्रभावित किए हों — लेकिन इस बार कीमतों में एकमुश्त दोगुनी वृद्धि ने मध्यम वर्ग की जेब पर असामान्य दबाव बनाया।

सांस्कृतिक महत्त्व और परंपरा

बंगाली समाज में विजयादशमी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। मिठाइयाँ इस एकजुटता की मूर्त अभिव्यक्ति हैं — एक ऐसा माध्यम जिसके ज़रिए परिवार और समुदाय अपने रिश्तों को नवीनीकृत करते हैं। इस वर्ष बढ़ी हुई कीमतें भले ही बजट पर भारी पड़ीं, लेकिन कोलकाता की सड़कों और बाज़ारों में दिखा उत्साह इस बात का प्रमाण रहा कि सांस्कृतिक जुड़ाव आर्थिक दबावों से अधिक मजबूत है।

क्या होगा आगे

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दूध और चीनी की थोक कीमतों में कमी नहीं आई, तो आने वाले त्योहारों — जैसे दीपावली — में भी मिठाइयों के दाम ऊँचे बने रह सकते हैं। व्यापारी संगठनों ने राज्य सरकार से कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला को स्थिर करने की माँग की है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की अचानक मूल्यवृद्धि से बचा जा सके।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो तब और तीखा दिखता है जब भावनात्मक रूप से अपरिहार्य रस्में दाँव पर हों। असली सवाल यह है कि जब परंपरा और बजट आपस में टकराते हैं, तो मध्यम वर्ग किस चीज़ की बलि देता है — और इस बार उत्तर साफ है: बजट की। यह प्रवृत्ति बताती है कि सांस्कृतिक माँग को महंगाई से प्रतिरोधी माना जाता है, जिसका फायदा आपूर्ति श्रृंखला के हर स्तर पर उठाया जाता है। राज्य सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए यह संकेत है कि त्योहारी सीज़न से पहले कच्चे माल की कीमतों पर निगरानी और हस्तक्षेप की व्यवस्था होनी चाहिए।
RashtraPress
21 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विजयादशमी 2026 पर कोलकाता में मिठाइयों की कीमतें कितनी बढ़ीं?
इस साल कोलकाता में मिठाइयों की कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं — जो पिछले वर्ष ₹10 से ₹15 प्रति पीस थीं, वे अब ₹20 से ₹30 प्रति पीस पर बिक रही हैं। दूध और चीनी की थोक कीमतों में उछाल और कारीगरों की बढ़ी दिहाड़ी इसके मुख्य कारण बताए गए हैं।
मिठाइयाँ इतनी महंगी क्यों हुईं?
दुर्गा पूजा से पहले दूध और चीनी के थोक दामों में भारी वृद्धि हुई, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई। इसके अलावा त्योहारी सीज़न में बढ़ी माँग और कारीगरों की बढ़ी दिहाड़ी ने भी मिठाइयों की कीमतें ऊँची कर दीं।
क्या महंगाई ने विजयादशमी की मिठाई परंपरा को प्रभावित किया?
कीमतों में उछाल के बावजूद बंगाली परिवारों ने मिठाई आदान-प्रदान की परंपरा नहीं छोड़ी। गृहिणी डोलन सेनगुप्ता जैसे कई लोगों ने बजट से अधिक खर्च करके भी रस्म निभाई, क्योंकि यह पर्व उनके लिए सामाजिक और भावनात्मक रूप से अपरिहार्य है।
आगे आने वाले त्योहारों पर भी मिठाइयाँ महंगी रहेंगी?
व्यापारियों के अनुसार यदि दूध और चीनी की कीमतें नहीं घटीं तो दीपावली जैसे आगामी त्योहारों पर भी मिठाइयाँ महंगी बनी रह सकती हैं। व्यापारी संगठनों ने राज्य सरकार से कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला स्थिर करने की माँग की है।
विजयादशमी पर मिठाइयों का बंगाली संस्कृति में क्या महत्त्व है?
विजयादशमी पर देवी दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ दुर्गा पूजा का समापन होता है। इस अवसर पर मिठाइयाँ बाँटना दशकों से बंगाली संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है — यह परिवारों और समुदायों को जोड़ने तथा आपसी मतभेद भुलाने का प्रतीकात्मक माध्यम माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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