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उस्ताद विलायत खां जयंती: 'आफताब-ए-सितार' की साधना, जब रियाज में उंगलियों से बहता था खून

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उस्ताद विलायत खां जयंती: 'आफताब-ए-सितार' की साधना, जब रियाज में उंगलियों से बहता था खून

सारांश

28 अगस्त 1928 को जन्मे उस्ताद विलायत खां ने सितार को गायकी की आवाज़ दी — मींड, गमक और बोल को तारों पर इस तरह साधा कि शब्द न होते हुए भी सुर बोलते थे। रियाज में उंगलियों से खून बहाने का जुनून और दो बार पद्म सम्मान ठुकराने का साहस — यही थी 'आफताब-ए-सितार' की असली पहचान।

मुख्य बातें

उस्ताद विलायत खां का जन्म 28 अगस्त 1928 को हुआ था; उन्हें 'आफताब-ए-सितार' की उपाधि से सम्मानित किया गया।
उन्होंने 'गायकी अंग' शैली विकसित की, जिसमें मींड, गमक और बोल को सितार पर उतारा गया।
रियाज के दौरान उंगलियाँ कट जाने और खून निकलने के बावजूद वे अभ्यास नहीं रोकते थे।
उन्होंने 1964 में पद्मश्री, 1968 और 2000 में पद्म विभूषण स्वीकार करने से इनकार किया।
1951 में इंग्लैंड सहित दुनिया भर में भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रतिनिधित्व किया।
13 मार्च 2004 को निधन; उनके पुत्र शुजात हुसैन खां और हिदायत खां इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

उस्ताद विलायत खां का जन्म 28 अगस्त 1928 को हुआ था — एक ऐसे संगीतकार जिनके लिए सितार महज वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति था। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका नाम आज भी गहरे सम्मान के साथ लिया जाता है, और उनकी 'गायकी अंग' शैली ने सितार वादन को एक नया आयाम दिया जो उनसे पहले किसी ने नहीं छुआ था। उन्हें 'आफताब-ए-सितार' — अर्थात सितार का सूर्य — की उपाधि यूं ही नहीं मिली थी।

खानदानी विरासत, निजी पहचान

विलायत खां का जन्म संगीत की उस समृद्ध खानदानी परंपरा में हुआ जहाँ सुर और सितार परिवार की पहचान का अभिन्न हिस्सा थे। उनके पिता उस्ताद इनायत खां और दादा उस्ताद इमदाद खां अपने-अपने दौर के प्रतिष्ठित सितार वादक थे। पीढ़ियों से चली आ रही यह संगीत-विरासत विलायत खां तक पहुँची, लेकिन उन्होंने इसे केवल आगे नहीं बढ़ाया — उन्होंने अपनी अलग और अमिट पहचान भी बनाई।

बचपन से ही उनका झुकाव सितार की ओर था। वह सुरों में भावनाएं तलाशते थे, और यही सोच आगे चलकर उनकी विशिष्ट 'गायकी अंग' शैली की आधारशिला बनी। इस शैली में उन्होंने गायन की बारीकियों — मींड, गमक और बोल — को सितार की तारों पर इस तरह उतारा कि शब्द न होते हुए भी सुर बोलते हुए महसूस होते थे। श्रोता अक्सर कह उठते थे कि सितार नहीं, कोई गा रहा है।

रियाज का वह जुनून जो खून से लिखा गया

इस मुकाम तक पहुँचने का रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था। विलायत खां के रियाज से जुड़े किस्से उनके असाधारण समर्पण की गवाही देते हैं। बताया जाता है कि अभ्यास के दौरान उनकी उंगलियाँ इतनी तेज़ी से सितार के तारों पर चलती थीं कि कई बार कट जाती थीं और खून तक निकल आता था।

किसी और के लिए यह दर्द रियाज रोकने का कारण बन सकता था, लेकिन विलायत खां के लिए नहीं। उनका मानना था कि हज़ारों सरगम के बीच अगर रुककर आराम कर लिया, तो पूरा अभ्यास-क्रम टूट जाएगा और फिर शुरुआत से उसी क्रम को साधना पड़ेगा। इसलिए दर्द के बावजूद उनका रियाज अनवरत चलता रहता था। यही जुनून उनकी कला में स्पष्ट झलकता था।

वैश्विक मंच पर भारतीय सितार

विलायत खां की पहचान सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। आज़ाद भारत के शुरुआती वर्षों में उन्होंने विदेशों में जाकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति दी। 1951 में इंग्लैंड में उनका कार्यक्रम खासतौर पर उल्लेखनीय माना जाता है। इसके बाद उन्होंने दुनिया के कई हिस्सों में सितार की धुन पहुँचाई और न्यू जर्सी को अपना दूसरा घर मानते थे।

उनकी लोकप्रियता फिल्मों तक भी पहुँची। सत्यजीत रे की चर्चित फिल्म 'जलसाघर' सहित कुछ फिल्मों में उनके सितार संगीत ने एक अलग रंग भरा। शास्त्रीय संगीत की गंभीरता के बावजूद उनकी प्रस्तुति में भावनाओं की ऐसी पकड़ थी कि वह आम श्रोताओं तक भी सहजता से पहुँच जाती थी।

सम्मान ठुकराने का साहस

विलायत खां अपनी कला के साथ-साथ अपने बेबाक स्वभाव के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने 1964 में पद्मश्री और 1968 में पद्म विभूषण सम्मान स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि उनकी कला और योगदान को उचित सम्मान नहीं दिया गया। वर्ष 2000 में जब दोबारा पद्म विभूषण देने की घोषणा हुई, तब भी उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया।

पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद उनकी कला के प्रशंसकों में थे। उन्हीं के कार्यकाल में विलायत खां को 'आफताब-ए-सितार' की उपाधि से सम्मानित किया गया — एक उपाधि जो उनकी कला की सच्ची कद्र करती थी।

विरासत जो आज भी जीवित है

13 मार्च 2004 को उस्ताद विलायत खां ने दुनिया को अलविदा कहा। लेकिन महान कलाकारों की भाँति उनकी विदाई के साथ उनकी कला समाप्त नहीं हुई। उनके दोनों बेटों — शुजात हुसैन खां और हिदायत खां — ने सितार की इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। उनकी 'गायकी अंग' शैली आज भी संगीत के विद्यार्थियों और श्रोताओं को प्रेरित करती है, और उनका नाम भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में सदा के लिए अंकित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पुरस्कार को नहीं। दो बार राष्ट्रीय सम्मान ठुकराना उनके आत्मसम्मान की गवाही देता है, लेकिन यह प्रश्न भी उठाता है कि क्या राज्य-प्रायोजित सम्मान की प्रणाली कला की वास्तविक कद्र कर पाती है। उनकी 'गायकी अंग' शैली ने शास्त्रीय सितार को उस श्रोता तक पहुँचाया जो रागों की पेचीदगियाँ नहीं जानता था — यह लोकतंत्रीकरण था कला का, बिना उसकी गहराई से समझौता किए। आज जब शास्त्रीय संगीत के दर्शक सिमटते जा रहे हैं, विलायत खां का यह दृष्टिकोण पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
RashtraPress
27 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उस्ताद विलायत खां कौन थे?
उस्ताद विलायत खां भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित सितार वादक थे, जिनका जन्म 28 अगस्त 1928 को हुआ था। उन्हें 'आफताब-ए-सितार' की उपाधि मिली और उनकी 'गायकी अंग' शैली ने सितार वादन को एक नई पहचान दी।
'गायकी अंग' शैली क्या है?
यह विलायत खां द्वारा विकसित सितार वादन की वह शैली है जिसमें गायन की विशेषताओं — मींड, गमक और बोल — को सितार की तारों पर उतारा जाता है। इस शैली में सुर इस तरह बोलते हैं कि श्रोता को लगता है जैसे कोई गा रहा हो।
विलायत खां ने पद्म सम्मान क्यों ठुकराया?
विलायत खां ने 1964 में पद्मश्री और 1968 तथा 2000 में पद्म विभूषण स्वीकार करने से इनकार किया। उनका मानना था कि उनकी कला और योगदान को उचित सम्मान नहीं दिया गया।
'आफताब-ए-सितार' की उपाधि उन्हें कैसे मिली?
यह उपाधि पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के कार्यकाल में विलायत खां को दी गई। 'आफताब-ए-सितार' का अर्थ है 'सितार का सूर्य', जो उनकी असाधारण कला के सम्मान में प्रदान किया गया।
उस्ताद विलायत खां की विरासत आज कैसे जीवित है?
13 मार्च 2004 को उनके निधन के बाद उनके पुत्र शुजात हुसैन खां और हिदायत खां सितार की इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी 'गायकी अंग' शैली आज भी संगीत के विद्यार्थियों और प्रेमियों को प्रेरित करती है।
राष्ट्र प्रेस
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