पश्चिम बंगाल राज्यसभा उपचुनाव: भाजपा के क्लीन स्वीप के आसार, TMC के दोनों गुट कमज़ोर
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल में 24 जुलाई 2026 को होने वाले राज्यसभा उपचुनाव में तीनों सीटें भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खाते में जाने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। मौजूदा विधानसभा गणित और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर गहरे गुटीय विभाजन के चलते ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले कालीघाट गुट के लिए यह चुनाव अस्तित्व की परीक्षा बन गया है।
विधानसभा गणित: भाजपा की निर्णायक बढ़त
राज्यसभा चुनाव में एकल हस्तांतरणीय मत (Single Transferable Vote) प्रणाली लागू होती है, जिसमें विधानसभा की संख्या-शक्ति ही निर्णायक होती है। आंकड़ों के अनुसार, भाजपा के पास फिलहाल 206 विधायक हैं — जो तीनों सीटें जीतने के लिए आवश्यक प्रथम वरीयता मतों से अधिक है।
गौरतलब है कि विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 294 से कम हो गई है। सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट छोड़कर भवानीपुर से चुनाव लड़ा था, जहाँ उन्होंने ममता बनर्जी को पराजित किया था। इसके अलावा पूर्व तृणमूल नेता हुमायूँ कबीर के दो सीटों से जीतने के कारण एक सीट रिक्त है।
TMC में गुटीय दरार: दोनों खेमे कमज़ोर
रिपोर्टों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस इस समय दो गुटों में बँटी हुई है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ लगभग 62 से 65 विधायक बताए जा रहे हैं, जबकि शेष विधायक ममता बनर्जी के कालीघाट गुट के साथ हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब चुनाव आयोग के समक्ष यह फैसला भी लंबित है कि 'वास्तविक' तृणमूल कांग्रेस का संगठन कौन-सा है। इस विभाजन की स्थिति में दोनों में से कोई भी गुट अकेले राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए आवश्यक संख्या तक नहीं पहुँच पा रहा।
ममता बनर्जी के लिए दोहरा संकट
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 24 जुलाई को कालीघाट गुट का कोई सीट न जीत पाना महज़ प्रतीकात्मक हार नहीं होगी। इससे पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में बागी गुट की स्थिति मज़बूत हो सकती है और ममता बनर्जी का संगठन पर दावा कमज़ोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अतीत में भी दलों में टूट और विधायकों के पाला बदलने से राज्यसभा चुनावों के नतीजे प्रभावित होते रहे हैं। कई मौकों पर क्षेत्रीय दलों के विधायकों के भाजपा के साथ जाने से राज्यसभा का गणित बदला है।
आगे क्या: कानूनी लड़ाई और नेतृत्व संघर्ष
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस चुनाव परिणाम के बाद TMC के भीतर नेतृत्व और पार्टी की पहचान को लेकर संघर्ष और तेज़ हो सकता है। 'असली टीएमसी कौन है' — इस सवाल पर आगे और टूट-फूट या कानूनी लड़ाइयों की संभावना भी बढ़ सकती है।
ममता बनर्जी को लंबे समय से विपरीत परिस्थितियों में भी डटे रहने वाली नेता के रूप में देखा जाता रहा है और वे इससे पहले भी कई कठिन दौरों से उबर चुकी हैं। लेकिन 24 जुलाई का नतीजा उनके राजनीतिक भविष्य और पार्टी पर नियंत्रण, दोनों के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।