अमला शंकर जयंती: वह नृत्य साधिका जिसने 1931 में यूरोप में भारतीय कला का परचम लहराया
सारांश
मुख्य बातें
अमला शंकर — यह नाम भारतीय नृत्य के इतिहास में उस अध्याय का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ एक स्त्री ने सामाजिक परंपराओं की सीमाओं को लाँघकर कला को अपनी पहचान बनाया। 27 जून उनकी जयंती का दिन है — एक ऐसी कलाकार को स्मरण करने का अवसर, जिन्होंने नृत्य को केवल मंच-प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन की साधना बना दिया। 27 जून 1919 को जेसोर (अब बांग्लादेश) में जन्मी अमला शंकर ने 101 वर्ष की आयु में 24 जुलाई 2020 को इस संसार से विदा ली, परंतु उनकी विरासत आज भी जीवित है।
प्रारंभिक जीवन और कला की ओर झुकाव
अमला शंकर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो कला और संस्कृति से गहराई से जुड़ा था। उनके पिता अक्षय कुमार नंदी प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे, जिन्होंने घर में ऐसा वातावरण बनाया जहाँ बचपन से ही कला के बीज अंकुरित हो सकें। उस युग में किसी युवती का नृत्य की दुनिया में कदम रखना सामाजिक दृष्टि से सहज नहीं था, फिर भी अमला ने धीरे-धीरे उन सीमाओं को पीछे छोड़ दिया।
यूरोप की यात्रा और उदय शंकर से मुलाकात
1931 में, जब अमला मात्र 11 वर्ष की थीं, वे अपने पिता के साथ फ्रांस गईं। वहाँ उनकी भेंट भारतीय नृत्य के महान कलाकार उदय शंकर से हुई, जो उस समय यूरोप के मंचों पर भारतीय नृत्य को नई पहचान दिला रहे थे। उदय शंकर का नृत्य देखकर अमला का जीवन एक नई दिशा में मुड़ गया। वे उनकी नृत्य मंडली का हिस्सा बन गईं और यहीं से उनकी असली कला-यात्रा का आरंभ हुआ। 1939 में दोनों कला-साधकों ने विवाह किया और मिलकर भारतीय नृत्य को एक नई दृष्टि दी।
यूरोपीय मंचों पर भारतीय नृत्य का परचम
अमला शंकर ने यूरोप के अनेक देशों में उदय शंकर की नृत्य मंडली के साथ प्रदर्शन किए। उस दौर में विदेशी मंचों पर भारतीय कला को स्थापित करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण था, किंतु अमला ने अपने आत्मविश्वास और अथक परिश्रम से यह संभव किया। उनकी सबसे उल्लेखनीय कृति 'कल्पना' (1948) रही — एक ऐसी फिल्म जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। व्यावसायिक दृष्टि से यह फिल्म उस समय अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी, परंतु आज इसे भारतीय नृत्य और सिनेमा के इतिहास में एक अमूल्य धरोहर माना जाता है।
व्यक्तिगत संघर्ष और कला में अडिगता
अमला शंकर का जीवन केवल मंच की चमक तक सीमित नहीं था। उनका निजी जीवन कई भावनात्मक उतार-चढ़ावों से भरा रहा। उदय शंकर के अन्य महिलाओं से संबंधों ने उन्हें गहरी पीड़ा दी, किंतु उन्होंने कभी नृत्य का दामन नहीं छोड़ा। अपने पुत्र आनंद की असमय मृत्यु ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया, फिर भी वे नृत्य सिखाती रहीं। जब जीवन ने करवट ली और रास्ते अलग हुए, तब उन्होंने कोलकाता में नृत्य संस्थान की जिम्मेदारी संभाली और वर्षों तक भारतीय नृत्य परंपरा को जीवित रखा।
सम्मान और विरासत
अमला शंकर के अप्रतिम योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। 2011 में पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित 'बंग विभूषण' से सम्मानित किया। 2012 में उन्हें 'संगीत नाटक अकादमी टैगोर रत्न पुरस्कार' से नवाज़ा गया। 24 जुलाई 2020 को 101 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय नृत्य का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन उनके शिष्यों और संस्थानों के माध्यम से उनकी कला आज भी जीवंत है।