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रक्षा मंत्रालय का ₹449 करोड़ का सौदा: नौसेना को मिलेंगे 20 स्वदेशी GNSS जैमर, 75% देशी सामग्री

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रक्षा मंत्रालय का ₹449 करोड़ का सौदा: नौसेना को मिलेंगे 20 स्वदेशी GNSS जैमर, 75% देशी सामग्री

सारांश

रक्षा मंत्रालय ने ₹449 करोड़ में 20 स्वदेशी ECGNSS जैमर खरीदने का अनुबंध किया — यह भारतीय नौसेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता में बड़ा इज़ाफा है। 75% देशी सामग्री की शर्त के साथ यह सौदा 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक ठोस कदम है।

मुख्य बातें

रक्षा मंत्रालय ने 10 जून 2026 को ₹449 करोड़ के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए।
20 ECGNSS जैमर बेंगलुरु की कंपनी ASSPL से खरीदे जाएंगे।
परियोजना में कम से कम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग अनिवार्य।
खरीद 'बाय इंडियन-IDDM' श्रेणी के तहत; रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में हस्ताक्षर।
यह प्रणाली दुश्मन के GNSS रिसीवर को जाम करने और सिग्नल स्पूफिंग में सक्षम है।

रक्षा मंत्रालय ने 10 जून 2026 को बेंगलुरु स्थित कंपनी अकॉर्ड सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड (ASSPL) के साथ ₹449 करोड़ के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारतीय नौसेना के लिए 20 एन्हांस्ड कैपेबिलिटी ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (ECGNSS) जैमर खरीदे जाएंगे। यह करार 'बाय (इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड)' श्रेणी के अंतर्गत किया गया है और इसमें कम से कम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग अनिवार्य है।

अनुबंध का विवरण और पृष्ठभूमि

रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, इस अनुबंध पर नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए गए। यह खरीद 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' नीति के तहत रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता घटाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। गौरतलब है कि भारत लंबे समय से रक्षा उपकरणों के सबसे बड़े आयातकों में शामिल रहा है, और इस तरह के स्वदेशी अनुबंध उस प्रवृत्ति को पलटने की कोशिश को दर्शाते हैं।

ECGNSS जैमर की तकनीकी क्षमताएँ

मंत्रालय के बयान के अनुसार, यह अत्याधुनिक प्रणाली दुश्मन के GNSS रिसीवर की सिग्नल-प्राप्ति और ट्रैकिंग क्षमता को कमज़ोर करने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त, यह सिग्नल स्पूफिंग और डिसेप्टिव जैमिंग जैसी उन्नत तकनीकों के ज़रिए शत्रु के नेविगेशन और लक्ष्य-निर्धारण तंत्र को भ्रमित कर सकती है। सरल अर्थ में, यह प्रणाली नौसैनिक युद्धपोतों को उन परिस्थितियों में भी सुरक्षित रखती है जहाँ दुश्मन उपग्रह-आधारित मार्गदर्शन प्रणालियों पर निर्भर हो।

नौसेना की युद्धक क्षमता पर असर

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन जैमर प्रणालियों की तैनाती से भारतीय नौसेना के युद्धपोत बहु-खतरे वाले समुद्री वातावरण में अधिक सुरक्षित और प्रभावी तरीके से संचालन कर सकेंगे। आधुनिक समुद्री संघर्षों में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) की भूमिका निर्णायक मानी जाती है — यह ऐसे समय में आया है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा चुनौतियाँ लगातार बढ़ रही हैं।

स्वदेशी रक्षा उद्योग को नई गति

यह अनुबंध केवल एक खरीद नहीं, बल्कि भारत के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक संकेत भी है। 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त यह सुनिश्चित करती है कि इस परियोजना का अधिकांश आर्थिक लाभ देश के भीतर ही रहे और घरेलू रक्षा उद्योग को मज़बूती मिले। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इस तरह की परियोजनाएँ भारत को रक्षा उपकरणों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं। आने वाले वर्षों में इस तकनीक के और विकास और निर्यात की संभावनाएँ भी खुल सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका रणनीतिक महत्व बड़ा है — इलेक्ट्रॉनिक युद्ध वह क्षेत्र है जहाँ भारत परंपरागत रूप से विदेशी तकनीक पर निर्भर रहा है। 'IDDM' श्रेणी और 75% स्वदेशी सामग्री की शर्त सही दिशा में है, लेकिन असली कसौटी यह होगी कि ASSPL समयसीमा में डिलीवरी करे और प्रणाली वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में खरी उतरे। हिंद-प्रशांत में बढ़ते तनाव के बीच नौसेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता को मज़बूत करना अपरिहार्य है, और यह सौदा उस ज़रूरत को स्वीकार करता है।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रक्षा मंत्रालय ने GNSS जैमर के लिए कितने करोड़ का अनुबंध किया है?
रक्षा मंत्रालय ने 10 जून 2026 को ₹449 करोड़ का अनुबंध किया है, जिसके तहत भारतीय नौसेना के लिए 20 ECGNSS जैमर खरीदे जाएंगे। यह अनुबंध बेंगलुरु स्थित ASSPL के साथ किया गया है।
ECGNSS जैमर क्या होता है और यह कैसे काम करता है?
ECGNSS जैमर एक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली है जो दुश्मन के उपग्रह-आधारित नेविगेशन रिसीवर की सिग्नल-प्राप्ति और ट्रैकिंग क्षमता को कमज़ोर करती है। यह सिग्नल स्पूफिंग और डिसेप्टिव जैमिंग तकनीकों से शत्रु के नेविगेशन तंत्र को भ्रमित भी कर सकती है।
इस सौदे में स्वदेशी सामग्री की क्या शर्त है?
इस परियोजना में कम से कम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग अनिवार्य है। खरीद 'बाय इंडियन-IDDM' (इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड) श्रेणी के तहत की जा रही है।
इस अनुबंध से भारतीय नौसेना को क्या फायदा होगा?
इन जैमर प्रणालियों की तैनाती से भारतीय नौसेना के युद्धपोत बहु-खतरे वाले समुद्री वातावरण में अधिक सुरक्षित और प्रभावी तरीके से संचालन कर सकेंगे। आधुनिक समुद्री युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता निर्णायक मानी जाती है।
यह सौदा 'आत्मनिर्भर भारत' के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
यह अनुबंध रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता घटाने और घरेलू रक्षा उद्योग को मज़बूत करने की दिशा में एक ठोस कदम है। 75% स्वदेशी सामग्री की शर्त यह सुनिश्चित करती है कि परियोजना का आर्थिक लाभ देश के भीतर रहे।
राष्ट्र प्रेस
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