सेबी का CAS फ्रेमवर्क: डेरिवेटिव्स सेटलमेंट में बदलाव के लिए जल्द आ सकता है कंसल्टेशन पेपर
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) शनिवार को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) पर एक विस्तृत कंसल्टेशन पेपर जारी करने की तैयारी में है, जिसका मुख्य उद्देश्य एक्सपायरी के दिन डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस तय करने की मौजूदा प्रक्रिया में सुधार करना है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नियामक इस व्यवस्था को पूरी तरह वापस लेने के पक्ष में नहीं है, बल्कि सेटलमेंट प्राइस की गणना को अधिक पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए नए विकल्प पेश करने पर विचार कर रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है जब बाजार प्रतिभागियों ने नए ऑक्शन सिस्टम के कारण एक्सपायरी वाले दिनों में अनपेक्षित उतार-चढ़ाव की शिकायत की है।
24 सितंबर की बोर्ड बैठक में चर्चा की संभावना
रिपोर्ट्स के अनुसार, कंसल्टेशन पेपर में प्रस्तावित बदलावों पर 24 सितंबर को होने वाली सेबी बोर्ड की अहम बैठक में औपचारिक चर्चा हो सकती है। इस प्रस्ताव के माध्यम से नियामक उन तकनीकी और प्रक्रियागत चिंताओं का समाधान करना चाहता है, जो डेरिवेटिव्स के अंतिम सेटलमेंट प्राइस से सीधे जुड़ी हैं। सेबी के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि “सीएएस फ्रेमवर्क बाजार में बना रहेगा” और नियामक प्रतिभागियों के व्यावहारिक फीडबैक की गहन समीक्षा कर रहा है ताकि व्यवस्था की कमियों को दूर किया जा सके।
एक्सपायरी पर भारी उतार-चढ़ाव बना बड़ा कारण
बाजार में हाल ही में लागू की गई इस व्यवस्था के बाद विशेष रूप से एक्सपायरी वाले सत्रों में तीव्र वोलैटिलिटी दर्ज की गई है। पिछले सप्ताह के एक कारोबारी सत्र के दौरान BSE सेंसेक्स का इंडिकेटिव क्लोज ऑक्शन के दौरान कुछ समय के लिए 2.5 प्रतिशत तक गिर गया था। इस अचानक गिरावट के चलते क्लोजिंग ऑक्शन के सीमित समय में ही पुट ऑप्शंस के प्रीमियम में 400-500 प्रतिशत तक की भारी तेजी दर्ज की गई। इसी तरह, मंगलवार को एक्सपायरी के दिन भी निफ्टी के पुट ऑप्शंस में कई गुना उछाल देखा गया, जिसने कई ट्रेडर्स और फंड हाउसों को असमंजस में डाल दिया।
मौजूदा सीएएस व्यवस्था का ढांचा
उल्लेखनीय है कि 3 अगस्त से प्रभावी हुए मौजूदा नियमों के तहत, फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) के अंतर्गत आने वाले शेयरों में सामान्य ट्रेडिंग दोपहर 3:15 बजे समाप्त हो जाती है। इसके बाद इन शेयरों को लगभग 20 मिनट के ऑक्शन विंडो में रखा जाता है, जहाँ बाय और सेल ऑर्डर्स के मिलान के आधार पर आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस तय होता है। वहीं दूसरी तरफ, गैर-F&O शेयरों में नियमित ट्रेडिंग शाम 3:30 बजे तक चलती है, जबकि स्टॉक और इंडेक्स डेरिवेटिव्स में सौदे 3:40 बजे तक जारी रहते हैं।
विश्लेषकों की चिंता और आगे की दिशा
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि ऑक्शन विंडो में लिक्विडिटी और भागीदारी सीमित रहने की वजह से कुछ बड़े ऑर्डर्स भी क्लोजिंग प्राइस पर असामान्य प्रभाव डाल देते हैं। इससे एक्सपायरी के दिन सिस्टमेटिक ऑप्शंस स्ट्रैटेजीज को निष्पादित करना काफी जोखिम भरा और अप्रत्याशित हो गया है। सेबी का आगामी कंसल्टेशन पेपर बाजार की स्थिरता बनाए रखते हुए मूल्य निर्धारण में हेरफेर की आशंकाओं को खत्म करने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है।