अशोक दीवान: 1975 हॉकी विश्व कप जिताने वाले गोलकीपर, जिन्होंने मॉन्ट्रियल ओलंपिक में भी दिखाया दम
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय हॉकी के इतिहास में अशोक दीवान का नाम उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल है, जिन्होंने देश को उसका इकलौता हॉकी विश्व कप दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई। 9 अगस्त 1954 को जन्मे अशोक दीवान को भारत के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर्स में गिना जाता है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी गोलकीपिंग से विरोधियों के हौसले पस्त किए।
हॉकी से लगाव और राष्ट्रीय टीम में एंट्री
बचपन से ही अशोक दीवान को हॉकी के प्रति गहरा लगाव था। घरेलू स्तर पर लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद उन्हें भारतीय हॉकी टीम में जगह मिली। उनकी चुस्त रिफ्लेक्स और गोल के सामने अडिग मौजूदगी ने चयनकर्ताओं को प्रभावित किया और 1975 के विश्व कप के लिए उनका चयन हुआ।
1975 विश्व कप: इतिहास रचने का पल
1975 हॉकी विश्व कप के फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ अशोक दीवान ने कई अहम बचाव कर भारत को पहली बार विश्व चैंपियन बनाया। यह भारतीय हॉकी का स्वर्णिम अध्याय था — और आज तक का इकलौता विश्व कप खिताब। गौरतलब है कि 1975 के बाद से भारतीय टीम दोबारा यह प्रतिष्ठित ट्रॉफी नहीं जीत सकी है, जो इस उपलब्धि को और भी दुर्लभ बनाता है।
मॉन्ट्रियल ओलंपिक 1976: कृत्रिम मैदान की चुनौती
1976 मॉन्ट्रियल ओलंपिक में अशोक दीवान भारतीय दल का हिस्सा रहे, लेकिन यह अनुभव कड़वा साबित हुआ। इस ओलंपिक में पहली बार हॉकी के मुकाबले कृत्रिम घास (Astroturf) पर कराए गए, जिसके लिए भारतीय टीम पर्याप्त रूप से तैयार नहीं थी। अभ्यास के दौरान अशोक दीवान के दो दाँत भी टूट गए थे। गोल्ड मेडल की प्रबल दावेदार मानी जा रही भारतीय टीम को इस ओलंपिक से खाली हाथ लौटना पड़ा — यह भारतीय हॉकी के लिए एक ऐतिहासिक झटका था।
मेजर ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मान
भारतीय हॉकी में उनके योगदान को देखते हुए 2002 में भारत सरकार ने अशोक दीवान को प्रतिष्ठित मेजर ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित किया — जो खेल जगत में दिया जाने वाला एक सर्वोच्च लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान है।
कोविड संकट और सरकारी सहायता
कोविड-19 महामारी के दौरान अशोक दीवान अपने बेटे से मिलने अमेरिका गए थे, लेकिन वीजा प्रतिबंधों के कारण वहीं फंस गए। इसी दौरान उनकी तबीयत भी अचानक बिगड़ गई। उन्होंने भारत के खेल मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ से मदद की अपील की, जिसके बाद भारत सरकार ने उनके इलाज की व्यवस्था कराई और वे स्वस्थ होने में सफल रहे। यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि देश के लिए पदक और गौरव लाने वाले खिलाड़ियों को संकट की घड़ी में संस्थागत समर्थन की कितनी ज़रूरत होती है।