दारा सिंह: 36 साल, 500+ कुश्तियाँ और एक भी हार नहीं — 'रुस्तम-ए-हिंद' की अजेय गाथा
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कुश्ती के सबसे चमकदार सितारे दारा सिंह ने अखाड़े से लेकर रुपहले पर्दे तक एक ऐसी विरासत छोड़ी, जिसे आज भी भारतीय खेल इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाता है। 6 फुट 2 इंच की विशाल कद-काठी और 127 किलो के दमदार शरीर के साथ उन्होंने 36 साल के पेशेवर करियर में 500 से अधिक कुश्तियाँ लड़ीं — और एक बार भी पराजय का मुँह नहीं देखा। 'रुस्तम-ए-हिंद' के नाम से विख्यात दारा सिंह को भारत में फ्रीस्टाइल रेसलिंग को जन-जन तक पहुँचाने का श्रेय जाता है।
बचपन और संघर्ष की नींव
19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर जिले के धरमचूक गाँव में दीदार सिंह रंधावा के रूप में जन्मे दारा सिंह बचपन से ही असाधारण शारीरिक बल के धनी थे। घी और दूध उनका प्रिय आहार था। महज 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह बच्चू कौर से हुआ और तीन साल बाद वे पिता भी बन गए। परिवार बढ़ने के साथ आजीविका की चुनौती भी सामने आई।
अपनी विशाल कद-काठी के कारण उन्हें सिंगापुर की एक ड्रम निर्माण कंपनी में काम मिला। वहीं उनकी मुलाकात पहलवान हरनाम सिंह से हुई, जिन्होंने उन्हें रेसलिंग की राह दिखाई। इस प्रेरणा ने एक मामूली कारखाना-मजदूर को भारत के सबसे महान पहलवान में बदल दिया।
खुराक और दिनचर्या — एक योद्धा की जीवनशैली
53 इंच के सीने वाले दारा सिंह की दैनिक खुराक किसी साधारण इंसान की कल्पना से परे थी — रोज़ाना 2 लीटर दूध, आधा किलो मटन, 8-10 रोटियाँ, घी, बादाम, काजू और किशमिश। इसके साथ ही वे मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने के लिए सप्ताह में एक दिन व्रत भी रखते थे — अनुशासन और समर्पण का अनूठा संगम।
विश्व विजेता: किंग कॉन्ग और लाऊ थेज को धूल चटाई
1959 में दारा सिंह ने पूर्व विश्व चैंपियन जॉर्ज गार्डियांका को पराजित कर कॉमनवेल्थ वर्ल्ड चैंपियनशिप अपने नाम की। इसके बाद 1962 में उनका सामना 200 किलो वजनी विश्व चैंपियन किंग कॉन्ग से हुआ। जहाँ सभी को लगा कि यह भारतीय पहलवान टिक भी नहीं पाएगा, वहाँ दारा सिंह ने किंग कॉन्ग को दोनों हाथों से हवा में उठाकर सीधे रिंग के बाहर पटक दिया। 1968 में उन्होंने तीन बार के हैवीवेट चैंपियन लाऊ थेज को हराकर विश्व चैंपियनशिप हासिल की — यह भारतीय कुश्ती के इतिहास का सबसे गौरवशाली क्षण था।
रामायण से घर-घर में पहचान
कुश्ती के मैदान के साथ-साथ दारा सिंह ने 1952 में फिल्म 'संगदिल' से अभिनय की शुरुआत की। फिल्मों में भीम, भगवान शिव और बजरंग बली के किरदार निभाने के बाद 80 के दशक में रामानंद सागर के महाकाव्य टीवी धारावाहिक 'रामायण' में हनुमान की भूमिका ने उन्हें एक अलग ही ऊँचाई पर पहुँचा दिया। उल्लेखनीय है कि नित्य मांसाहार करने वाले दारा सिंह ने हनुमान की भूमिका के लिए मांस त्याग दिया था। इस किरदार ने उन्हें इतना पूजनीय बना दिया कि लोग उनसे आशीर्वाद लेने लगे।
राजनीति, संन्यास और विरासत
1978 में उन्होंने 'दारा स्टूडियो' की स्थापना की। 1983 में कुश्ती से संन्यास लेने के बाद 1998 में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े। वे राज्यसभा के लिए नामांकित होने वाले पहले खिलाड़ी बने और 2003 से 2009 तक राज्यसभा सदस्य रहे।
7 जुलाई 2012 को हार्ट अटैक के बाद अस्पताल में भर्ती हुए दारा सिंह को लो-ब्लड फ्लो के कारण ब्रेन डैमेज हो गया और 12 जुलाई 2012 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। 2018 में उन्हें मरणोपरांत प्रतिष्ठित WWE हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया — एक ऐसे योद्धा को श्रद्धांजलि, जिसे उसके जीते-जी कोई हरा नहीं सका।