खेलो इंडिया योजना पैरा स्पोर्ट के लिए गेम-चेंजर: विश्व चैंपियन तीरंदाज शीतल देवी
सारांश
मुख्य बातें
विश्व चैंपियन और पैरालंपिक पदक विजेता पैरा-कंपाउंड तीरंदाज शीतल देवी ने 7 अगस्त 2026 को कहा कि केंद्र सरकार की खेलो इंडिया योजना पैरा-स्पोर्ट के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है, बशर्ते इसे ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। उनके अनुसार, यह योजना दिव्यांग प्रतिभावान बच्चों की शुरुआती पहचान और उन्हें आवश्यक सहयोग दिलाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
शीतल देवी का अपना सफर — अवसर ने बदली तकदीर
जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ के एक दूर-दराज गाँव से निकलकर विश्व मंच पर तिरंगा फहराने वाली 18 वर्षीया शीतल देवी ने अपने संघर्ष को साझा करते हुए कहा, 'पैरा-एथलीटों के लिए बड़ी चुनौती प्रतिभा नहीं, बल्कि अवसर का न मिलना है। किश्तवाड़ की एक लड़की अच्छी कोचिंग और सहयोग मिलने से ही शीतल देवी बन पाई, जिसे दुनिया जानती है।'
उन्होंने जोड़ा, 'मेरी कहानी सफलता की है, लेकिन किसी दूर-दराज के गाँव में उतना ही सक्षम बच्चा शायद यह भी नहीं जानता होगा कि पैरा स्पोर्ट्स होते हैं। हमारे बीच का फर्क आम तौर पर अवसर का होता है।' यह बयान उस व्यापक असमानता की ओर इशारा करता है जो ग्रामीण और शहरी पैरा-एथलीटों के बीच आज भी मौजूद है।
₹29,054 करोड़ की खेलो इंडिया योजना — क्या है खास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगले पाँच वर्षों के लिए घोषित नई खेलो इंडिया योजना में ₹29,054 करोड़ का निवेश प्रस्तावित है। शीतल ने बताया कि इस योजना के नौ मुख्य घटकों में प्रतिभा खोज, कोच और सहयोगी स्टाफ का विकास, खेल सुविधाओं का उन्नयन और हाई-परफॉर्मेंस प्रशिक्षण वातावरण को मजबूत करना शामिल है।
उन्होंने विशेष रूप से पैरा खेलो इंडिया एथलीट्स के एक बड़े समूह के गठन और इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट्स को जोड़ने की पहल की सराहना की। उनके अनुसार, 'इस स्कीम का मकसद होनहार बच्चों को पहले खोजना और उनके विकास के हर चरण में उन्हें सहयोग देना है।'
ग्रामीण दिव्यांग बच्चों तक पहुँच — सबसे बड़ी चुनौती
शीतल ने रेखांकित किया कि पूरे भारत में, खासकर गाँवों और छोटे शहरों में, हजारों दिव्यांग बच्चे हैं जिनमें असीम क्षमता है, लेकिन जागरूकता, कोचिंग या अवसर के अभाव में वे खेल से जुड़ ही नहीं पाते। उन्होंने कहा, 'किसी बच्चे को सिर्फ पैरा स्पोर्ट्स समझने वाला कोच ढूंढने के लिए घर नहीं छोड़ना चाहिए।'
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत पेरिस पैरालंपिक 2024 में अपने अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद पैरा-खेलों में व्यवस्थागत सुधार की दिशा में काम कर रहा है। शीतल ने स्पष्ट किया कि यदि पैरा-स्पोर्ट अकादमियाँ और प्रशिक्षित कोच बच्चों के घर के पास उपलब्ध हों, तो परिवार उन्हें खेल में भेजने के लिए अधिक आत्मविश्वास महसूस करेंगे।
स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया और सरकारी सहयोग की भूमिका
अपनी सफलता का श्रेय देते हुए शीतल ने कहा, 'मुझे कोच, स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI), सरकार और अन्य बहुत से लोगों से मदद मिली। उस सहयोग ने मुझे बड़े सपने देखने और दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करने का आत्मविश्वास दिया।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि खेलो इंडिया पैरा गेम्स जैसी प्रतियोगिताओं में भागीदारी से युवा एथलीटों का आत्मविश्वास और प्रदर्शन दोनों निखरते हैं।
योजना की सफलता के लिए शीतल ने केंद्र और राज्यों के बीच सक्रिय सहयोग को अनिवार्य बताया। उनके अनुसार, 'योजना को नतीजों में बदलने के लिए राज्यों को पूरी तरह से शामिल होना चाहिए।'
सफलता की असली कसौटी — पदक नहीं, भागीदारी
शीतल देवी ने अंत में कहा कि नई खेलो इंडिया योजना का सबसे बड़ा असर केवल पदकों की संख्या से नहीं, बल्कि उन दिव्यांग बच्चों की संख्या से आँका जाएगा जो यह विश्वास करने लगें कि खेल उनके लिए भी है। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना है कि खेलो इंडिया स्कीम की सफलता तब होगी जब भारत के हर जिले, गाँव और कोने से दिव्यांग बच्चे आत्मविश्वास के साथ खेल में आएंगे।'
यह दृष्टिकोण भारत की पैरा-खेल नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है — जहाँ लक्ष्य अब केवल एलीट प्रदर्शन नहीं, बल्कि समावेशी भागीदारी है।