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मिल्खा सिंह पुण्यतिथि: ओलंपिक पदक न जीत पाने का मलाल जो 'फ्लाइंग सिख' ताउम्र लिए रहे

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मिल्खा सिंह पुण्यतिथि: ओलंपिक पदक न जीत पाने का मलाल जो 'फ्लाइंग सिख' ताउम्र लिए रहे

सारांश

शरणार्थी शिविर से 'फ्लाइंग सिख' तक — मिल्खा सिंह की जिंदगी जीत और एक अधूरी तमन्ना की कहानी है। 1960 रोम ओलंपिक में मामूली अंतर से चूका पदक उनका ताउम्र अफसोस रहा। नीरज चोपड़ा ने उनका सपना पूरा किया, पर मिल्खा उस पल को देख नहीं सके।

मुख्य बातें

मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर 1929 को गोविंदपुरा, पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ; 1947 के विभाजन के बाद वह शरणार्थी बनकर भारत आए।
1958 कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतकर वह इस प्रतियोगिता में पदक जीतने वाले पहले भारतीय धावक बने।
1960 रोम ओलंपिक में 400 मीटर में चौथे स्थान पर रहना उनके जीवन का सबसे बड़ा अफसोस रहा।
पाकिस्तानी जनरल अयूब खान ने उन्हें 'फ्लाइंग सिख' की उपाधि दी।
भारत सरकार ने 1959 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
कोविड-19 के कारण 18 जून 2021 को 91 वर्ष की आयु में निधन; नीरज चोपड़ा के टोक्यो स्वर्ण से कुछ दिन पहले।

मिल्खा सिंह — भारतीय ट्रैक एंड फील्ड के सबसे चमकदार नाम — 18 जून 2021 को 91 वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा हुए, लेकिन एक टीस उनके साथ ही गई: 1960 रोम ओलंपिक में मामूली अंतर से चूका वह पदक, जो उनकी पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा अफसोस बना रहा। शरणार्थी कैंप से अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स के शिखर तक का उनका सफर भारतीय खेल इतिहास का एक अद्वितीय अध्याय है।

विभाजन की त्रासदी से एथलेटिक्स के शिखर तक

मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर 1929 को गोविंदपुरा, पंजाब (वर्तमान में पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वह एक शरणार्थी के रूप में भारत आए और दिल्ली के पुराना किला स्थित शरणार्थी शिविर तथा बाद में शाहदरा की पुनर्वास कॉलोनी में रहे। बचपन से दौड़ने का जुनून रखने वाले मिल्खा ने 1951 में भारतीय सेना में भर्ती होकर अपनी प्रतिभा को एक मंच दिया।

स्वर्णिम उपलब्धियाँ: एशियन गेम्स से कॉमनवेल्थ तक

1958 एशियन गेम्स में मिल्खा सिंह ने 200 मीटर और 400 मीटर दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीते। उसी वर्ष 1958 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी स्वर्ण जीतकर वह इस प्रतियोगिता में देश के लिए पदक जीतने वाले पहले भारतीय धावक बने — एक ऐतिहासिक उपलब्धि। 1958 कटक नेशनल गेम्स में 200 और 400 मीटर में स्वर्ण तथा 1962 एशियन गेम्स में 400 मीटर और 1600 मीटर रिले में स्वर्ण पदक उनके करियर की और बड़ी उपलब्धियाँ रहीं। 1964 कलकत्ता नेशनल गेम्स में 400 मीटर में उन्होंने रजत पदक जीता।

'फ्लाइंग सिख' की उपाधि और पाकिस्तान से जीत

1960 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अनुरोध पर मिल्खा सिंह ने पाकिस्तान के तेज धावक अब्दुल खालिक के साथ दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और जीत हासिल की। उनकी अद्भुत गति से प्रभावित होकर तत्कालीन पाकिस्तानी जनरल अयूब खान ने उन्हें 'फ्लाइंग सिख' की उपाधि दी — एक नाम जो उनकी पहचान बन गया।

ओलंपिक का वह चौथा स्थान — ताउम्र का अफसोस

मिल्खा सिंह ने तीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया — 1956 मेलबर्न, 1960 रोम और 1964 टोक्यो1960 रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में वह मामूली अंतर से पदक चूककर चौथे स्थान पर रहे। यह पल उनके जीवन का सबसे बड़ा अफसोस बन गया, जिसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से कई बार व्यक्त किया। वह चाहते थे कि कोई भारतीय एथलीट ट्रैक एंड फील्ड में ओलंपिक स्वर्ण जरूर जीते। यह सपना तब पूरा हुआ जब नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक 2020 में जैवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीता — लेकिन इस ऐतिहासिक क्षण से महज कुछ दिन पहले ही मिल्खा सिंह दुनिया को अलविदा कह चुके थे।

सम्मान और विरासत

भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के सम्मान में 1959 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा। कोविड-19 के कारण 18 जून 2021 को 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनका जीवन आज भी लाखों युवा एथलीटों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भारतीय एथलेटिक्स में उनके योगदान की गूँज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस भारत की है जो विभाजन की राख से उठकर वैश्विक मंच पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था। 1960 रोम में चौथा स्थान महज एक खेल परिणाम नहीं था — वह उस पूरी पीढ़ी की सामूहिक पीड़ा का प्रतीक बन गया जो संसाधनों की कमी के बावजूद देश का नाम रोशन करना चाहती थी। विडंबना यह है कि नीरज चोपड़ा ने जब उनका सपना पूरा किया, तब मिल्खा उस क्षण के साक्षी नहीं बन सके — यह भारतीय खेल इतिहास का सबसे मार्मिक संयोग है। उनकी विरासत आज भी यह सवाल उठाती है कि क्या हम अपने एथलीटों को वह समर्थन और ढाँचा दे रहे हैं जो मिल्खा के समय नहीं था।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मिल्खा सिंह का सबसे बड़ा अफसोस क्या था?
मिल्खा सिंह का सबसे बड़ा अफसोस 1960 रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में मामूली अंतर से पदक चूककर चौथे स्थान पर रहना था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कई बार यह निराशा जाहिर की और चाहते थे कि कोई भारतीय एथलीट ट्रैक एंड फील्ड में ओलंपिक स्वर्ण जरूर जीते।
मिल्खा सिंह को 'फ्लाइंग सिख' की उपाधि किसने और क्यों दी?
1960 में पाकिस्तान के तेज धावक अब्दुल खालिक के साथ दौड़ में मिल्खा सिंह की अद्भुत गति देखकर तत्कालीन पाकिस्तानी जनरल अयूब खान इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मिल्खा को 'फ्लाइंग सिख' की उपाधि दी। यह नाम उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान बन गया।
मिल्खा सिंह ने कितने ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया?
मिल्खा सिंह ने तीन ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया — 1956 मेलबर्न, 1960 रोम और 1964 टोक्यो। 1960 रोम ओलंपिक में वह सबसे करीब आए, लेकिन चौथे स्थान पर रहे।
मिल्खा सिंह की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थीं?
मिल्खा सिंह ने 1958 एशियन गेम्स में 200 और 400 मीटर में स्वर्ण, 1958 कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण (कॉमनवेल्थ में पदक जीतने वाले पहले भारतीय धावक), और 1962 एशियन गेम्स में 400 मीटर व 1600 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीते। भारत सरकार ने 1959 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
मिल्खा सिंह का निधन कब और कैसे हुआ?
मिल्खा सिंह का निधन 18 जून 2021 को 91 वर्ष की आयु में कोविड-19 के कारण हुआ। उनके निधन के कुछ ही दिन बाद नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में जैवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीता — वह सपना पूरा हुआ जो मिल्खा सिंह ने ताउम्र देखा था।
राष्ट्र प्रेस
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