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भारत का फीफा वर्ल्ड कप सपना: शाजी प्रभाकरन बोले — '10-15 साल में संभव, यह रॉकेट साइंस नहीं'

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भारत का फीफा वर्ल्ड कप सपना: शाजी प्रभाकरन बोले — '10-15 साल में संभव, यह रॉकेट साइंस नहीं'

सारांश

AIFF के पूर्व महासचिव शाजी प्रभाकरन का दावा है कि भारत अगले 10-15 साल में फीफा वर्ल्ड कप खेल सकता है — लेकिन इसके लिए चाहिए सुशासन, जमीनी ढाँचा और सरकारी समर्थन। फुटबॉल को वे भारत की सबसे बड़ी 'सॉफ्ट पावर' मानते हैं।

मुख्य बातें

शाजी प्रभाकरन ने कहा कि भारत अगले 10 से 15 वर्षों में फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर सकता है।
उन्होंने सुशासन , ग्रासरूट विकास , युवा प्रतिस्पर्धा और एलीट स्तर के सुधार को चार प्रमुख प्राथमिकताएँ बताईं।
हर आयु वर्ग में 10-12 टीमें और प्रत्येक में लगभग 2,000 बेहतरीन खिलाड़ी तैयार करने का सुझाव दिया।
केप वर्डे और कुराकाओ जैसे छोटे देशों को प्रेरणा का स्रोत बताते हुए डायस्पोरा को राष्ट्रीय टीम में शामिल करने की वकालत की।
फुटबॉल में एक पीढ़ी तैयार होने में 12 से 15 साल लगते हैं, इसलिए तत्काल ढाँचागत निवेश जरूरी है।
लियोनेल मेसी ने इस टूर्नामेंट में 8 गोल और 2 असिस्ट दिए; अर्जेंटीना लगातार दूसरे वर्ल्ड कप खिताब की दहलीज पर है।

ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) के पूर्व महासचिव शाजी प्रभाकरन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 1.4 अरब की आबादी वाला भारत अगले 10 से 15 वर्षों में फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर सकता है — बशर्ते कि सुशासन, जमीनी विकास और सामूहिक प्रयास को प्राथमिकता दी जाए। नई दिल्ली में दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि यह लक्ष्य 'कोई रॉकेट साइंस नहीं' है, केवल इच्छाशक्ति और एकजुटता की दरकार है।

फीफा वर्ल्ड कप 2026 फाइनल का वैश्विक महत्व

प्रभाकरन के अनुसार, अर्जेंटीना और स्पेन के बीच होने वाला फाइनल केवल एक खेल आयोजन नहीं है। उन्होंने कहा कि इस टूर्नामेंट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगभग 20 बिलियन डॉलर और वैश्विक स्तर पर 20 बिलियन डॉलर अतिरिक्त का योगदान दिया, जिससे कुल आर्थिक प्रभाव 40 बिलियन डॉलर से अधिक रहा। उनके अनुसार, फाइनल को दुनिया भर में लगभग 2 अरब दर्शक देखेंगे, जो फुटबॉल की एकजुट करने वाली अद्वितीय शक्ति का प्रमाण है। 48 टीमों के इस विस्तारित संस्करण ने खेल को और अधिक समावेशी बनाया है।

मेसी और अर्जेंटीना की विरासत

लियोनेल मेसी के बारे में प्रभाकरन ने कहा कि वे अर्जेंटीना के लिए एकजुट करने वाली शक्ति हैं। इस टूर्नामेंट में मेसी ने 8 गोल किए और इंग्लैंड के विरुद्ध सेमीफाइनल में 2 असिस्ट देकर टीम को फाइनल में पहुँचाया। उनके अनुसार, यह मेसी का तीसरा वर्ल्ड कप फाइनल है और अर्जेंटीना के लिए लगातार दूसरा खिताब जीतने का अवसर। प्रभाकरन ने कहा कि अर्जेंटीना की फुटबॉल विरासत पहले से ही समृद्ध रही है — देश ने तीन वर्ल्ड कप जीते हैं — और मेसी उस विरासत को और ऊँचाई पर ले जा रहे हैं।

अर्जेंटीना पर आलोचना: प्रभाकरन का नजरिया

अर्जेंटीना की खेल शैली और कथित विवादों पर उठे सवालों के जवाब में प्रभाकरन ने कहा कि यह सोशल मीडिया के युग की स्वाभाविक परिघटना है। उनके अनुसार, 'फुटबॉल एक खुली किताब है' — अंततः गोल करना और जीतने के लिए परिश्रम करना ही मायने रखता है। उन्होंने कहा कि सफलता से ईर्ष्या होती है और उसी से ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं जिनमें 'शायद ही कोई सच्चाई हो।'

भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी चुनौतियाँ

प्रभाकरन ने माना कि भारत के वर्ल्ड कप से बाहर रहने का कारण संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि 'पर्याप्त मेहनत न करना' है। उन्होंने कहा कि सुधार के लिए चार मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा — सुशासन, जमीनी कार्यक्रम, युवा प्रतिस्पर्धा और एलीट स्तर का विकास। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वर्ल्ड कप के दौरान फुटबॉल की चर्चा यह साबित करती है कि क्रिकेट के बाद यह भारत के सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है।

केप वर्डे और कुराकाओ से सबक

छोटे देशों की सफलता का उदाहरण देते हुए प्रभाकरन ने कहा कि केप वर्डे और कुराकाओ जैसे देश इसलिए आगे बढ़े क्योंकि उन्होंने अपने डायस्पोरा को राष्ट्रीय टीम में शामिल किया और एकल विजन के साथ काम किया। उनके अनुसार, खेल में सफलता का आबादी या आर्थिक शक्ति से कोई सीधा संबंध नहीं — यह इच्छाशक्ति और एकजुटता का खेल है।

भारत के लिए वर्ल्ड कप का रोडमैप

प्रभाकरन ने भारतीय फुटबॉल के लिए एक ठोस खाका सुझाया। उन्होंने कहा कि हर आयु वर्ग में 10 से 12 टीमें बनाई जाएं और प्रत्येक टीम में लगभग 2,000 बेहतरीन खिलाड़ी तैयार किए जाएं। अंडर-17 से लेकर सीनियर स्तर तक विदेशी पेशेवरों की सेवाएँ ली जाएं। इसके साथ ही पारदर्शिता जरूरी है — फैंस को यह दिखना चाहिए कि धन कहाँ से आता है और कहाँ जाता है। उन्होंने फुटबॉल को भारत की 'सॉफ्ट पावर' बनाने की संभावना पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, सरकार का समर्थन अब तक अपेक्षित स्तर पर नहीं मिला है, और बड़े उद्योग समूहों के साथ साझेदारी इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। गौरतलब है कि फुटबॉल में एक पीढ़ी तैयार होने में 12 से 15 साल लगते हैं, इसलिए अभी से ठोस कदम उठाना अनिवार्य है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारतीय फुटबॉल में 'सामूहिक प्रयास' और 'सुशासन' की माँग दशकों से उठती रही है — और AIFF खुद प्रशासनिक विवादों के कारण 2022 में फीफा द्वारा निलंबित हो चुका है। असली सवाल यह है कि जब संस्थागत इच्छाशक्ति बार-बार कमज़ोर साबित हुई हो, तो अगले 10-15 साल में बदलाव की गारंटी कौन देगा। फुटबॉल पिरामिड के निचले स्तर पर निवेश की बात तो होती है, लेकिन सत्यापन-योग्य डेटा — कितने स्कूलों में कोच हैं, कितने जिलों में लीग चलती है — सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। बिना जवाबदेही के रोडमैप, रोडमैप नहीं — घोषणापत्र बन जाता है।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शाजी प्रभाकरन कौन हैं और भारतीय फुटबॉल में उनकी क्या भूमिका रही है?
शाजी प्रभाकरन ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) के पूर्व महासचिव हैं। उन्होंने भारतीय फुटबॉल के प्रशासन और विकास में लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संगठनों के साथ भी काम किया है।
प्रभाकरन के अनुसार भारत फीफा वर्ल्ड कप के लिए कब तक क्वालीफाई कर सकता है?
प्रभाकरन का मानना है कि अगर आज से ही सही दिशा में काम शुरू हो, तो भारत अगले 10 से 15 वर्षों में फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर सकता है। उन्होंने इसे 'कोई रॉकेट साइंस नहीं' बताया।
भारत अब तक फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्यों नहीं क्वालीफाई कर पाया?
प्रभाकरन के अनुसार, समस्या संसाधनों की नहीं बल्कि पर्याप्त मेहनत, एकजुटता और ईमानदार प्रयासों की कमी की है। उन्होंने सुशासन, ग्रासरूट कार्यक्रम, युवा प्रतिस्पर्धा और एलीट स्तर के विकास को प्रमुख कमज़ोरियाँ बताया।
भारत के वर्ल्ड कप रोडमैप में क्या-क्या शामिल होना चाहिए?
प्रभाकरन ने सुझाया कि हर आयु वर्ग में 10-12 टीमें और प्रत्येक में लगभग 2,000 बेहतरीन खिलाड़ी तैयार किए जाएं, अंडर-17 से सीनियर स्तर तक विदेशी पेशेवरों की मदद ली जाए, पारदर्शिता सुनिश्चित हो और बड़े उद्योग समूहों के साथ साझेदारी की जाए।
केप वर्डे और कुराकाओ जैसे छोटे देश भारत से बेहतर क्यों करते हैं?
प्रभाकरन के अनुसार, ये देश एकल विजन के साथ काम करते हैं, अपने डायस्पोरा को राष्ट्रीय टीम में शामिल करते हैं और संसाधनों की परवाह किए बिना पूरी क्षमता एक ही लक्ष्य पर लगाते हैं। यही इच्छाशक्ति और एकजुटता उन्हें बड़े देशों से आगे ले जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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