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सौरव गांगुली: 'दादा' जिन्होंने टीम इंडिया को आक्रामक क्रिकेट का पाठ पढ़ाया

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सौरव गांगुली: 'दादा' जिन्होंने टीम इंडिया को आक्रामक क्रिकेट का पाठ पढ़ाया

सारांश

मैच फिक्सिंग के दंश से उबरती टीम इंडिया को जब एक नेता की ज़रूरत थी, तब कोलकाता के 'दादा' ने कमान संभाली। गांगुली ने न सिर्फ युवराज, सहवाग और धोनी जैसी प्रतिभाओं को तराशा, बल्कि भारतीय क्रिकेट को वह आक्रामक पहचान दी जो आज भी टीम की रीढ़ है।

मुख्य बातें

सौरव गांगुली का जन्म 8 जुलाई 1972 को कोलकाता में हुआ; पिता चंडीदास गांगुली क्लब क्रिकेटर थे।
1996 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट पदार्पण पर पहली पारी में 131 रन ; 'गॉड ऑफ ऑफ-साइड' की उपाधि मिली।
26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ विश्व कप में 183 रन ; द्रविड़ के साथ 318 रन की साझेदारी।
कप्तानी में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2002 का संयुक्त खिताब और वनडे विश्व कप 2003 का फाइनल।
युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह, ज़हीर खान और महेंद्र सिंह धोनी को राष्ट्रीय टीम में स्थापित किया।
1997 में अर्जुन पुरस्कार, 2004 में पद्म श्री; बाद में BCCI अध्यक्ष बने।

सौरव गांगुली भारत के सबसे प्रभावशाली क्रिकेट कप्तानों में गिने जाते हैं — एक ऐसे नेता जिन्होंने मैच फिक्सिंग के कलंक से उबरती टीम इंडिया को न केवल मैदान पर बल्कि मानसिक रूप से भी खड़ा किया। कोलकाता के 'दादा' ने भारतीय क्रिकेट की संस्कृति को हमेशा के लिए बदल दिया — विदेशी धरती पर आँखें मिलाकर खेलने की जो परंपरा उन्होंने शुरू की, वह आज भी टीम की पहचान है।

शुरुआती जीवन और क्रिकेट की नींव

8 जुलाई 1972 को कोलकाता के एक समृद्ध परिवार में जन्मे सौरव के पिता चंडीदास गांगुली एक जाने-माने क्लब क्रिकेटर थे। घर में क्रिकेट का माहौल था — परिवार के अधिकतर सदस्य बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे, और सौरव ने भी यही शैली अपनाई। उनके बड़े भाई स्नेहाशीष बंगाल की तरफ से क्रिकेट खेलते थे।

शुरुआत में सौरव को फुटबॉल अधिक पसंद था। 13 वर्ष की आयु में समर क्रिकेट कैंप में भेजे जाने के बाद खेल के प्रति उनकी रुचि जागी। बंगाल और ओडिशा के बीच एक अंडर-15 फ्रेंडली मैच में एक खिलाड़ी की अनुपस्थिति में उन्हें मौका मिला — और उन्होंने शतक जड़ दिया। यह पारी उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बनी। इसके बाद परिवार ने घर के पास 2 कंक्रीट पिचें बनवाईं, एक निजी कोच रखा और घर में ही जिम की व्यवस्था की।

अंतरराष्ट्रीय पदार्पण और 'गॉड ऑफ ऑफ-साइड' की पहचान

गांगुली ने 1989 में रणजी ट्रॉफी में पदार्पण किया। घरेलू क्रिकेट में लगातार प्रदर्शन के बाद 1992 में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे में डेब्यू का मौका मिला, लेकिन मात्र 3 रन बनाकर वे टीम से बाहर हो गए।

करीब चार साल बाद 1996 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट पदार्पण पर उन्होंने पहली ही पारी में 20 चौकों की मदद से 131 रन बनाए। दूसरे टेस्ट में 136 और 48 रन की पारी ने उनकी जगह पक्की कर दी। ऑफ-साइड पर उनके बेमिसाल स्ट्रोक के कारण उन्हें 'गॉड ऑफ ऑफ-साइड' और 'प्रिंस ऑफ कोलकाता' जैसी उपाधियाँ मिलीं।

26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ वनडे विश्व कप मैच में गांगुली ने 158 गेंदों में 7 छक्के और 17 चौकों की मदद से 183 रन की यादगार पारी खेली। इसी मैच में उन्होंने राहुल द्रविड़ के साथ दूसरे विकेट के लिए 318 रन की साझेदारी की। सचिन तेंदुलकर के साथ उन्होंने 176 पारियों में 47.55 की औसत से कुल 8,227 रन बनाए।

कप्तानी: एक नए युग की शुरुआत

मैच फिक्सिंग विवाद के बाद भारतीय क्रिकेट अपने सबसे कठिन दौर में था। सचिन तेंदुलकर द्वारा कप्तानी छोड़ने के बाद यह जिम्मेदारी गांगुली को सौंपी गई। उन्होंने टीम में आक्रामकता और आत्मविश्वास का नया संचार किया — भारतीय खिलाड़ी अब विपक्षी टीमों को उनकी ही धरती पर चुनौती देने लगे।

गांगुली की कप्तानी में भारत ने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2002 में संयुक्त विजेता का खिताब जीता और वनडे विश्व कप 2003 के फाइनल तक पहुँचा। टीम ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की धरती पर जाकर उन्हें कड़ी टक्कर दी — जो उस दौर में असाधारण माना जाता था।

युवा प्रतिभाओं के पोषक

गांगुली की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह, ज़हीर खान और महेंद्र सिंह धोनी जैसे खिलाड़ियों को भारतीय क्रिकेट में स्थापित किया। इन खिलाड़ियों ने आगे चलकर भारत को विश्व क्रिकेट का शिखर दिलाया।

सम्मान और प्रशासनिक भूमिका

उत्कृष्ट योगदान के लिए गांगुली को 1997 में अर्जुन पुरस्कार और 2004 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। संन्यास के बाद उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) का अध्यक्ष पद संभाला, जहाँ उन्होंने प्रशासनिक स्तर पर भी भारतीय क्रिकेट को नई दिशा देने का प्रयास किया। गांगुली का सफर मैदान से बोर्डरूम तक एक ऐसे क्रिकेटर की कहानी है जिसने हर भूमिका में 'दादागिरी' का अपना अंदाज़ बरकरार रखा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनकी असली विरासत है — प्रतिभा की पहचान और उसे मौका देने का साहस। धोनी से लेकर सहवाग तक, जिन खिलाड़ियों ने बाद में भारत को विश्व विजेता बनाया, उनमें से अधिकांश गांगुली की 'लैब' से निकले थे। यह भी विचारणीय है कि मैच फिक्सिंग के सबसे गहरे संकट में जब भारतीय क्रिकेट की साख दाँव पर थी, तब गांगुली ने टीम को न केवल जोड़ा बल्कि उसे जीतना सिखाया — और यही उन्हें महज एक अच्छे बल्लेबाज से महान कप्तान की श्रेणी में ले जाता है।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सौरव गांगुली को 'दादा' क्यों कहा जाता है?
'दादा' बंगाली में बड़े भाई को कहते हैं — यह उपनाम गांगुली को उनके नेतृत्व, व्यक्तित्व और कोलकाता से गहरे जुड़ाव के कारण मिला। क्रिकेट मैदान पर उनकी दबदबे वाली उपस्थिति ने इस नाम को और पक्का किया।
गांगुली का सबसे यादगार वनडे प्रदर्शन कौन सा है?
26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ विश्व कप मैच में गांगुली ने 158 गेंदों में 7 छक्के और 17 चौकों की मदद से 183 रन बनाए। इसी पारी में राहुल द्रविड़ के साथ 318 रन की साझेदारी की, जो उस समय वनडे रिकॉर्ड था।
कप्तान के रूप में गांगुली की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही?
गांगुली की कप्तानी में भारत ने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2002 का संयुक्त खिताब जीता और वनडे विश्व कप 2003 के फाइनल तक पहुँचा। इसके अलावा, उन्होंने युवराज सिंह, सहवाग, हरभजन, ज़हीर और धोनी जैसी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय टीम में स्थापित किया।
गांगुली को कौन-से राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं?
सौरव गांगुली को 1997 में अर्जुन पुरस्कार और 2004 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। संन्यास के बाद वे BCCI के अध्यक्ष भी बने।
गांगुली ने क्रिकेट में रुचि कब और कैसे विकसित की?
शुरुआत में फुटबॉल पसंद करने वाले गांगुली को 13 वर्ष की आयु में समर क्रिकेट कैंप में भेजा गया। बंगाल-ओडिशा अंडर-15 फ्रेंडली मैच में अचानक मौका मिला और उन्होंने शतक जड़ा, जो उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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