सैयद शाहिद हाकिम: रोम ओलंपिक 1960 से द्रोणाचार्य सम्मान तक, भारतीय फुटबॉल का एक अध्याय
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय फुटबॉल के इतिहास में सैयद शाहिद हाकिम का नाम उन विरल व्यक्तित्वों में शामिल है जिन्होंने मैदान पर खिलाड़ी के रूप में और उसके बाद कोच तथा रेफरी के रूप में खेल को नई दिशा दी। 23 जून 1939 को हैदराबाद में जन्मे शाहिद हाकिम ने 1960 के रोम ओलंपिक में भारतीय फुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व किया और बाद में 2017 में द्रोणाचार्य लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित हुए। 22 अगस्त 2021 को 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
पिता की विरासत, बेटे की पहचान
शाहिद हाकिम के पिता सैयद अब्दुल रहीम भारतीय फुटबॉल के महान नामों में गिने जाते हैं। बचपन से ही पिता की छत्रछाया में पले-बढ़े शाहिद ने फुटबॉल की बारीकियाँ सीधे उन्हीं से सीखीं। यह विरासत महज पारिवारिक नहीं थी — यह एक पूरी फुटबॉल संस्कृति का हस्तांतरण था। गौरतलब है कि 1960 के रोम ओलंपिक में जब शाहिद भारतीय टीम के खिलाड़ी थे, तब उस टीम के कोच स्वयं उनके पिता सैयद अब्दुल रहीम थे — एक ऐसा संयोग जो भारतीय खेल इतिहास में दुर्लभ है।
रोम ओलंपिक 1960 और भारत का प्रदर्शन
रोम ओलंपिक में भारतीय टीम ग्रुप चरण से आगे नहीं बढ़ सकी, किंतु टूर्नामेंट में फ्रांस के विरुद्ध 1-1 से ड्रॉ खेलकर उसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह परिणाम उस दौर में भारतीय फुटबॉल की संघर्षशीलता का प्रतीक बना। शाहिद हाकिम उस दल के सक्रिय सदस्य थे और इस अनुभव ने उनके खेल-जीवन को गहराई से प्रभावित किया।
घरेलू करियर और सैन्य सेवा
घरेलू फुटबॉल में शाहिद हाकिम ने सर्विसेज की ओर से खेलते हुए प्रतिष्ठित संतोष ट्रॉफी जीती। उन्होंने भारतीय वायु सेना की फुटबॉल टीम का भी प्रतिनिधित्व किया। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय सेना की टीमें घरेलू फुटबॉल की रीढ़ मानी जाती थीं।
कोच, रेफरी और प्रशासक के रूप में योगदान
खिलाड़ी के रूप में संन्यास लेने के बाद शाहिद हाकिम ने अंतरराष्ट्रीय रेफरी की भूमिका निभाई और 1988 में एएफसी एशियन कप में अंपायरिंग की। 1998 में उन्होंने महिंद्रा एंड महिंद्रा की टीम के मैनेजर के रूप में डूरंड कप खिताब दिलाया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने बंगाल मुंबई एफसी को भी कोचिंग दी और भारतीय राष्ट्रीय टीम के सहायक कोच के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं।
द्रोणाचार्य सम्मान और विरासत
2017 में भारत सरकार ने फुटबॉल कोचिंग में उनके असाधारण योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें द्रोणाचार्य लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा। यह सम्मान उनके छह दशकों से अधिक के फुटबॉल से जुड़ाव की स्वीकृति था। 22 अगस्त 2021 को 82 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय फुटबॉल ने एक ऐसा स्तंभ खोया जिसने खिलाड़ी, रेफरी, कोच और प्रशासक — हर भूमिका में खेल को समृद्ध किया। उनकी विरासत आज भी उन खिलाड़ियों और कोचों में जीवित है जिन्हें उन्होंने तराशा।