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पीके बनर्जी: 15 साल में नौकरी, भूखे पेट मैदान में उतरे, रोम ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ दागा ऐतिहासिक गोल

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पीके बनर्जी: 15 साल में नौकरी, भूखे पेट मैदान में उतरे, रोम ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ दागा ऐतिहासिक गोल

सारांश

15 साल की उम्र में नौकरी, खाली पेट ट्रेनिंग और रोम ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ ऐतिहासिक गोल — पीके बनर्जी की कहानी सिर्फ फुटबॉल की नहीं, एक अदम्य इरादे की है। 84 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 65 गोल और 'त्रिमूर्ति' की विरासत आज भी भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी धरोहर है।

मुख्य बातें

प्रदीप कुमार बनर्जी का जन्म 23 जून 1936 को जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल में हुआ था।
मात्र 15 वर्ष की आयु में एक केबल कंपनी में ₹135 प्रतिमाह पर नौकरी मिली; आर्थिक तंगी में अक्सर भूखे पेट मैदान में उतरे।
1960 रोम ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ गोल दागकर मुकाबला 1-1 से ड्रॉ कराया।
1962 एशियन गेम्स में चुनी गोस्वामी और तुलसीदास बलराम के साथ 'त्रिमूर्ति' तिकड़ी ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया।
खेल करियर में 84 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 65 गोल ; 1961 में अर्जुन पुरस्कार और 2004 में फीफा ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित।
20 मार्च 2020 को 83 वर्ष की आयु में निधन।

भारतीय फुटबॉल के महानायक प्रदीप कुमार बनर्जी — जिन्हें दुनिया पीके बनर्जी के नाम से जानती है — का जीवन संघर्ष, समर्पण और असाधारण प्रतिभा की अमर कहानी है। 1962 एशियन गेम्स में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम के स्तंभ रहे पीके बनर्जी ने गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी फुटबॉल का दामन नहीं छोड़ा। 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित यह खिलाड़ी आज भी भारतीय फुटबॉल की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

संघर्ष भरा बचपन और परिवार की जिम्मेदारी

23 जून 1936 को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में जन्मे पीके बनर्जी का परिवार विभाजन से पहले जमशेदपुर में स्थानांतरित हो गया था। उनके पिता प्रोवत बनर्जी सरकारी सेवा में थे, लेकिन वेतन इतना सीमित था कि परिवार का भरण-पोषण मुश्किल से होता था। इसी बीच परिवार कलकत्ता आ गया और कुछ समय बाद पिता का निधन हो गया।

भाई-बहनों में सबसे बड़े होने के कारण परिवार की पूरी जिम्मेदारी पीके के कंधों पर आ गई। लेकिन विषम परिस्थितियों ने उनके हौसले को नहीं तोड़ा — उन्होंने पढ़ाई और फुटबॉल दोनों जारी रखे।

15 साल की उम्र में नौकरी, भूखे पेट ट्रेनिंग

पीके बनर्जी की फुटबॉल प्रतिभा इतनी असाधारण थी कि मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्हें एक केबल कंपनी में नौकरी मिल गई, जहाँ उन्हें प्रतिमाह ₹135 वेतन मिलता था। 17 वर्ष की उम्र में वे भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्टर बन गए, जहाँ वेतन पिछली नौकरी से मात्र ₹2 अधिक था।

आर्थिक तंगी के उन दिनों में पीके अक्सर खाली पेट ही ट्रेनिंग करते और मैच खेलते थे। यह कठोर जीवन उनके खेल की नींव बना।

क्लब करियर और राष्ट्रीय टीम में चयन

साल 1954 में पीके बनर्जी आर्यन फुटबॉल क्लब से जुड़े और 1955 में ईस्टर्न रेलवे की टीम का हिस्सा बने। उनकी कप्तानी में 1958 में ईस्टर्न रेलवे ने फुटबॉल लीग चैंपियनशिप जीती। इसी वर्ष उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय टीम में पदार्पण किया।

साल 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में पीके बनर्जी के शानदार प्रदर्शन की बदौलत भारत सेमीफाइनल तक पहुँचा — जो आज भी भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है।

रोम ओलंपिक 1960 और ऐतिहासिक गोल

1960 रोम ओलंपिक में पीके बनर्जी ने भारतीय टीम की कमान संभाली। इस दौरान उन्होंने फ्रांस के खिलाफ एक निर्णायक गोल दागा, जिससे मुकाबला 1-1 से ड्रॉ रहा। यह गोल भारतीय फुटबॉल इतिहास के सबसे यादगार क्षणों में दर्ज है।

करीब दो वर्ष बाद 1962 जकार्ता एशियन गेम्स में पीके बनर्जी ने अपने सर्वश्रेष्ठ खेल से भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। चुनी गोस्वामी और तुलसीदास बलराम के साथ उनकी स्ट्राइक तिकड़ी को 'त्रिमूर्ति' का ऐतिहासिक नाम दिया गया।

सम्मान, संन्यास और विरासत

फुटबॉल में उत्कृष्ट योगदान के लिए पीके बनर्जी को 1961 में 'अर्जुन पुरस्कार' से नवाजा गया। 1967 में उन्होंने खेल से संन्यास लिया, तब तक वे 84 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में 65 गोल दाग चुके थे।

खिलाड़ी जीवन के बाद पीके बनर्जी ने कोचिंग में कदम रखा और 1970 एशियन गेम्स के लिए भारतीय टीम के संयुक्त कोच बनाए गए। 2004 में उन्हें प्रतिष्ठित 'फीफा ऑर्डर ऑफ मेरिट (शताब्दी)' से सम्मानित किया गया। 20 मार्च 2020 को 83 वर्ष की आयु में पीके बनर्जी का निधन हो गया, लेकिन भारतीय फुटबॉल में उनकी विरासत अमर है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब पीके बनर्जी जैसे खिलाड़ियों की विरासत सिर्फ नॉस्टेल्जिया नहीं, बल्कि एक सवाल है — उस स्तर तक वापस पहुँचने में छह दशक क्यों लग रहे हैं? संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि ढाँचागत प्रतिबद्धता की कमी ही असली चुनौती है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीके बनर्जी कौन थे और भारतीय फुटबॉल में उनका क्या योगदान था?
पीके बनर्जी यानी प्रदीप कुमार बनर्जी भारत के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खिलाड़ियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने 84 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 65 गोल किए। उन्होंने 1962 एशियन गेम्स में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया और 1960 रोम ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ ऐतिहासिक गोल दागा।
पीके बनर्जी को 15 साल की उम्र में नौकरी कैसे मिली?
पीके बनर्जी की फुटबॉल प्रतिभा से प्रभावित होकर एक केबल कंपनी ने उन्हें मात्र 15 वर्ष की आयु में ₹135 प्रतिमाह पर नौकरी दी। 17 साल की उम्र में वे भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्टर बने, जहाँ वेतन ₹2 अधिक था।
1960 रोम ओलंपिक में पीके बनर्जी का गोल क्यों ऐतिहासिक माना जाता है?
1960 रोम ओलंपिक में पीके बनर्जी ने फ्रांस के खिलाफ गोल दागकर मुकाबला 1-1 से ड्रॉ कराया था। यह उस दौर में भारतीय फुटबॉल की वैश्विक उपस्थिति का प्रतीक बना और आज भी भारतीय फुटबॉल इतिहास के सबसे यादगार क्षणों में शुमार है।
'त्रिमूर्ति' किसे कहा जाता था?
1962 एशियन गेम्स में पीके बनर्जी, चुनी गोस्वामी और तुलसीदास बलराम की स्ट्राइक तिकड़ी को 'त्रिमूर्ति' कहा गया। इन तीनों की साझेदारी ने भारत को जकार्ता एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक दिलाया।
पीके बनर्जी को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
पीके बनर्जी को 1961 में 'अर्जुन पुरस्कार' और 2004 में 'फीफा ऑर्डर ऑफ मेरिट (शताब्दी)' से सम्मानित किया गया। खेल के बाद उन्होंने कोचिंग में भी योगदान दिया और 1970 एशियन गेम्स के लिए भारतीय टीम के संयुक्त कोच रहे।
राष्ट्र प्रेस
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