त्रिशा जॉली: गोपीचंद एकेडमी से कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 कांस्य तक, पिता की पहचान ने बदली किस्मत
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी त्रिशा जॉली का सफर यह साबित करता है कि सही मार्गदर्शन और अटूट लगन मिल जाए तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं। 27 मई 2003 को केरल में जन्मी त्रिशा ने बचपन से बैडमिंटन के प्रति असाधारण रुझान दिखाया, जिसे उनके पिता — एक स्कूल के शारीरिक शिक्षक — ने समय रहते पहचाना। आज त्रिशा महिला युगल विश्व रैंकिंग के शीर्ष-10 में अपनी जगह बना चुकी हैं और बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में देश के लिए कांस्य पदक जीत चुकी हैं।
पिता की नज़र ने पहचानी प्रतिभा
त्रिशा के पिता स्कूल में शारीरिक शिक्षक थे और खेल की बारीकियों से भलीभाँति परिचित थे। बेटी के खेल में जो नैसर्गिक प्रतिभा थी, उसे उन्होंने शुरुआत में ही भाँप लिया। पिता की देखरेख में त्रिशा ने बैडमिंटन की तकनीकी बारीकियाँ सीखना शुरू कीं और धीरे-धीरे इस खेल में रमती चली गईं।
हैदराबाद की राह और गोपीचंद एकेडमी
केरल में उस समय बैडमिंटन के लिए आवश्यक प्रशिक्षण सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। इस चुनौती से पार पाने के लिए त्रिशा ने अपना घर-शहर छोड़कर हैदराबाद का रुख किया और विख्यात गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी में दाखिला लिया। यह निर्णय उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जूनियर स्तर पर लगातार प्रभावशाली प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय बैडमिंटन जगत में चर्चा का विषय बना दिया।
कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐतिहासिक सफलता
त्रिशा की सबसे बड़ी उपलब्धि 2022 में आई, जब उन्होंने बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में गायत्री गोपीचंद के साथ महिला युगल में कांस्य पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई। उसी वर्ष ऑल इंग्लैंड ओपन में भी इस जोड़ी ने इतिहास रचा — त्रिशा-गायत्री इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट के सेमीफाइनल तक पहुँचने वाली पहली भारतीय जोड़ी बनीं।
एशिया चैंपियनशिप और सुपर 300 खिताब
2024 में एशिया टीम चैंपियनशिप में त्रिशा कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहीं। इसी दौरान उन्होंने सैयद मोदी इंटरनेशनल टूर्नामेंट में महिला युगल खिताब अपने नाम किया, जो उनका पहला BWF सुपर 300 स्तर का खिताब था। यह जीत उनके करियर की परिपक्वता की ओर इशारा करती है।
आगे की राह
लगातार शानदार प्रदर्शन की बदौलत त्रिशा महिला युगल विश्व रैंकिंग में शीर्ष-10 में जगह बना चुकी हैं। आने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में एक बार फिर उनसे पदक की उम्मीद है। त्रिशा जॉली का सफर भारत के उन युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।