अभिनेत्री शकीला: 'बाबूजी धीरे चलना' से 50-60 के दशक तक हिंदी सिनेमा की अमिट छाप
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर — 1950 और 1960 के दशक — में जिन अभिनेत्रियों ने अपनी अदाकारी और परदे पर अपनी मौजूदगी से दर्शकों के दिल जीते, उनमें शकीला का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 'आर पार', 'सीआईडी' और 'चाइना टाउन' जैसी चर्चित फिल्मों से पहचान बनाने वाली शकीला ने लगभग 14 वर्षों के करियर में 50 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी आवाज़ और अदाकारी पर फिल्माए गए सदाबहार गीत आज भी पुरानी पीढ़ी के दिलों में ताज़ा हैं।
प्रारंभिक जीवन और मुंबई का सफर
विभिन्न स्रोतों में जन्म वर्ष को लेकर अंतर मिलता है, हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार शकीला का वास्तविक नाम बादशाह जहां था और उनका जन्म 1 जनवरी 1936 को मध्य पूर्व में हुआ था। उनके परिवार की जड़ें अफगानिस्तान और ईरान के शाही परिवारों से जुड़ी बताई जाती हैं। बचपन में परिवार पर कठिनाइयाँ आईं और शकीला अपनी बहनों नूर और नसरीन के साथ मुंबई पहुँचीं, जहाँ उनकी बुआ फिरोजा बेगम ने तीनों की परवरिश की।
फिल्मी दुनिया से शकीला का परिचय उनकी बुआ के माध्यम से हुआ, जिन्हें सिनेमा देखने का गहरा शौक था। परिवार का संबंध प्रसिद्ध फिल्मकार ए.आर. कारदार और महबूब खान से भी था। कारदार ने ही शकीला को फिल्म 'दास्तान' में काम करने का पहला अवसर दिया और तभी से उन्होंने 'बादशाह जहां' की जगह शकीला नाम से अभिनय करना शुरू किया।
मुख्य घटनाक्रम: फिल्मी करियर की उड़ान
शुरुआती दौर में 'गुमाश्ता', 'सिंदबाद द सेलर', 'आगोश', 'अरमान' और 'शहंशाह' जैसी फिल्मों में काम करने के बाद शकीला को प्रमुख भूमिकाएँ मिलने लगीं। उनके करियर में गुरु दत्त निर्देशित 'आर पार' (1954) निर्णायक मोड़ साबित हुई। इस फिल्म की सफलता ने शकीला को एक व्यापक पहचान दिलाई। इसके बाद 1956 में आई 'सीआईडी' में उन्होंने देव आनंद और वहीदा रहमान जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया।
शकीला की अन्य चर्चित फिल्मों में 'हातिम ताई', 'पोस्ट बॉक्स 999', 'श्रीमान सत्यवादी' और 'चाइना टाउन' शामिल हैं। 1962 में आई 'चाइना टाउन' में उन्होंने शम्मी कपूर के साथ काम किया। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा में मसाला एंटरटेनमेंट और कॉस्ट्यूम ड्रामा का दौर जोरों पर था।
यादगार गीत और अमर पहचान
शकीला की लोकप्रियता केवल उनके अभिनय तक सीमित नहीं थी — उन पर फिल्माए गए गीतों ने भी उन्हें अमर बना दिया। 'बाबूजी धीरे चलना', 'नींद न मुझको आए' और 'लेके पहला पहला प्यार' जैसे गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊँचाई दी। 'चाइना टाउन' का गीत 'बार बार देखो' भी उनके चर्चित गीतों में गिना जाता है। गौरतलब है कि यही वह दौर था जब गीत-संगीत, अभिनय और कलाकार की परदे पर उपस्थिति — तीनों मिलकर किसी फिल्म की सफलता तय करते थे।
निजी जीवन और अंतिम वर्ष
करियर के शीर्ष दौर के बाद शकीला ने फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली। विवाह के पश्चात वह अपने पति के साथ ब्रिटेन चली गईं। उनकी एक बेटी मीनाज थीं, जिनका निधन 1991 में हो गया था। बाद के वर्षों में शकीला वापस मुंबई लौट आई थीं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति बेहद सीमित हो गई थी।
परिवार में एक और उल्लेखनीय रिश्ता था — उनकी बहन नूर की शादी मशहूर अभिनेता और कॉमेडियन जॉनी वॉकर से हुई थी, जिससे जॉनी वॉकर शकीला के बहनोई थे। रिपोर्टों के अनुसार, 20 सितंबर 2017 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से शकीला का निधन हो गया। उनके जाने के साथ हिंदी सिनेमा के एक यादगार अध्याय का पटाक्षेप हो गया।
विरासत और योगदान
शकीला उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में से एक थीं जिन्होंने गुरु दत्त, देव आनंद और शम्मी कपूर जैसे उस दौर के शीर्ष सितारों के साथ परदे पर काम किया। मुख्यधारा के साथ-साथ फैंटेसी और कॉस्ट्यूम ड्रामा शैली में भी उनकी पकड़ थी, जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती थी। उनका करियर यह भी बताता है कि उस दशक का हिंदी सिनेमा विविध शैलियों और प्रयोगों का केंद्र था, जिसमें हर कलाकार की अपनी अनूठी भूमिका होती थी।