7.8% जीडीपी ग्रोथ पर विपक्ष का हमला: 'आंकड़े जमीनी हकीकत से कोसों दूर'
सारांश
मुख्य बातें
भारत की वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि के सरकारी आंकड़े सामने आते ही राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहाँ सत्तापक्ष इसे देश की आर्थिक मजबूती का प्रमाण बता रहा है, वहीं विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इन आंकड़ों को आम जनता की वास्तविक स्थिति से बेमेल करार दिया है। नई दिल्ली में 1 सितंबर को विभिन्न विपक्षी नेताओं ने महंगाई, बेरोज़गारी और घरेलू बचत में गिरावट के मुद्दे उठाते हुए इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।
मुख्य घटनाक्रम
समाजवादी पार्टी (SP) के सांसद अवधेश प्रसाद ने कहा, 'यह जमीनी हकीकत से बहुत दूर है। आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था बहुत अस्थिर हालत में है। हमारी विदेश नीति और अर्थव्यवस्था अमेरिका पर निर्भर हो गई हैं। इसलिए, जमीनी हकीकत ऐसी रिपोर्टों में बताई गई बातों से बिल्कुल अलग है।' प्रसाद का यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत के आर्थिक आंकड़ों की व्याख्या को लेकर अर्थशास्त्रियों में भी मतभेद हैं।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्यसभा सांसद पी. संतोष कुमार ने कहा, 'इस तरह के आंकड़े तो हमेशा आते रहते हैं। असल सवाल यह है कि आम आदमी को इससे कितना फायदा हो रहा है? और सरकार इस सवाल पर चुप है। महंगाई चरम पर है, नीति आयोग के मुताबिक बेरोज़गारी भी बढ़ रही है। ऐसे में इस तरह के बड़े-बड़े दावे करने का क्या मतलब है? हो सकता है कि तकनीकी रूप से ये सही हों, लेकिन आम आदमी के लिए इनका कोई मतलब नहीं है।'
पंजाब कांग्रेस के एससी विभाग के इंचार्ज सुधीर चौधरी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा, 'जब महंगाई बढ़ रही थी, प्याज और लहसुन महंगे हो रहे थे, उन्होंने कहा था — मैं इन्हें नहीं खाती, तो मुझे क्या फर्क पड़ता है? आप जीडीपी की बात करते हैं, लेकिन क्या महंगाई नहीं है? पेट्रोल और डीजल कितने महंगे हैं?'
आम आदमी पार्टी (AAP) की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने भी इन आंकड़ों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, 'यह 7.8 का आंकड़ा देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन क्या जमीनी स्तर पर इसका कोई असर दिखता है? जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की रिपोर्ट कहती है कि देश में परिवारों की बचत पिछले पाँच दशकों में सबसे कम है और बैंक क्रेडिट ग्रोथ को 18 प्रतिशत दिखाया गया — यानी लोग कर्ज लेकर अपना गुज़ारा कर रहे हैं — तो क्या यह सच्चाई इन आंकड़ों में दिखती है? क्या यह बताता है कि आज भी देश के 80 करोड़ नागरिक सरकारी अनाज पर निर्भर हैं?'
आम जनता पर असर
विपक्षी नेताओं के तर्कों का सार यह है कि जीडीपी वृद्धि का लाभ व्यापक जनसमूह तक नहीं पहुँच रहा। महंगाई — विशेष रूप से प्याज, चीनी, पेट्रोल और डीजल की कीमतें — आम परिवारों की क्रय शक्ति को क्षीण कर रही हैं। गौरतलब है कि RBI के आंकड़ों के अनुसार घरेलू बचत दर में गिरावट और उपभोक्ता ऋण में वृद्धि एक साथ हो रही है, जो आर्थिक विकास की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
आलोचकों का कहना है कि जीडीपी एक समग्र संकेतक है जो असमानता को नहीं दर्शाता। यह ऐसे समय में आया है जब नीति आयोग की रिपोर्टों में भी रोज़गार की गुणवत्ता और आय वितरण पर चिंताएँ दर्ज हैं। आंकड़ों के अनुसार, 80 करोड़ से अधिक लोगों का सरकारी खाद्य सहायता पर निर्भर रहना यह संकेत देता है कि उच्च जीडीपी वृद्धि और व्यापक जन-कल्याण के बीच की खाई अभी पाटी नहीं गई है।
क्या होगा आगे
यह बहस संसद के आगामी सत्र में भी गूँजने की संभावना है, जहाँ विपक्ष महंगाई नियंत्रण और रोज़गार सृजन पर सरकार से जवाब माँगने की तैयारी में है। सत्तापक्ष के लिए चुनौती यह होगी कि वह मैक्रो-आर्थिक आंकड़ों और सूक्ष्म-स्तरीय जन-जीवन के बीच की दूरी को पाटने वाली नीतिगत पहल प्रस्तुत करे।